औपनिवेसिक सत्ता सभ्यता कय भ्रमजाल अउर लोकगीत : बजरंग बिहारी ‘बजरू’

ई आलेख  आकार मा भले थोर लागय मुला निगाह मा बहुत फैलाव औ गहरायी लिहे अहय। कयिउ बाति अस हयँ

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बजरंग बिहारी ‘बजरू’ केर गजल (२) : उठाए बीज कै गठरी सवाल बोइत है!

कवि बजरू के्र गजलन की पहिली कड़ी के बाद ई दूसरि कड़ी आय। पहिली कड़ी  ‘हियाँ’ देखयँ। अब सीधे गजलन

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बजरंग बिहारी ‘बजरू’ केर गजल (१) : गजल मामूली है लेकिन लिहेबा सच्चाई.

पहिल मार्च सन १९७२ क अवध के गोन्डा जिला मा बजरंग बिहारी ‘बजरू’ क्यार जनम भा रहा। देहाती जिंदगी अउर

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बजरंग तिवारी ‘बजरू’ केरि अवधी गजल

हंस पत्रिका के जुलाई वाले अंक मा बजरंग बिहारी ‘बजरू’ केर ई अवधी गजल पढ़तै-खन जिउ निहाल होइगा। ‘हंस’ हिन्दी

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