दिल्ली के दरबार कै अब हम का बिस्वास करी ? (कवि अउर कंठ : समीर शुक्ल)

कबि समीर सुकुल जी अवधी के नये कबियन मा गिना जइहैं, इनकै नवापन यहि बात मा है कि अब तक

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कविता : मन कै अँधेरिया (कवि-हरिश्चंद्र पांडेय ‘सरल’ / कंठ-डा. मनोज मिश्र)

कबि अउर कबिता : कबि हरिश्चंद्र पांडेय ‘सरल’ कै जनम सन १९३२ मा फैजाबाद-अवध के पहितीपुर-कवलापुर गाँव मा भा रहा।

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सबका जलचढ़ी ( शिवरात्रि ) केरि सुभकामना ..

मोहारे के सिवाले पै माई.. सिव द्रोही मम दास कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा॥ सैव-बैसनौ के बीचे रारि

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