पाहीमाफी [२०] : लागि कटान, कुल बहि बिलान -१

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग”,  दुसरका भाग , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग१३-वाँ भाग १४-वाँ भाग , १५-वाँ भाग१६-वाँ भाग , १७-वाँ भाग , १८-वाँ भाग , १९-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई २०-वाँ भाग :

Gopalganj_flood_1502984559पाहीमाफी गाँव मा बाढ़ि आइ गय हय। पूरा गाँव छर-छर कटान मा कटत-कटत सरजू नदी मा बिलोपि उठा। सरजू माई गाँव लील लिहिन। सब कुछ उछिन्न होइगा :
उच्छिन्न होइ गय पूरा गाँव
ओन्नइस सौ इक्यासी मा!
आशाराम जागरथ बाढ़ कय पूरा विवरन यहि तिना करत अहयँ कि आपौ क वहिकै नजदीकी अहसास हुवय लागे। आहिस्ता-आहिस्ता नदी बाढ़ति जाति अहै। यहि बाति कय घर वालेन मा, गाँव मा, चरिचा हुअति अहय। कवि तब लरिकईं मा अहय। ऊ राति के सोइ जाहीं पावत। ओहकै बालमन ह्वईं अनिस्ट के आसंका मा उलझा रहत हय :
जल्दी न औंघाई आवै
सोची दूर तक राती मा.
गौर करय वाली बाति हय कि जब खोपड़ी पै जल-ताण्डव मचा अहय, तब्बौ जाति व्यवस्था, भेद व्यवस्था, आपन असर देखाये अहय। बावजूद कि ‘न ऊंचनीच न भेदभाव / सबकै घर कटै कटानी मा.’! जहाँ एक तरफ़ बाढ़ कै भुक्तभोगी अंसुवान बिलखत अहय, ह्वईं सवर्न दंभ मौजिउ लियत अहय। : संपादक
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  • लागि कटान, कुल बहि बिलान -१

बरखा कै मौसम जब आवै
काटै नदिया काटत आवै
जेस कउनौ अजगर बहुत बड़ा
मुंह बाय-बाय लीलत जावै
सीवान कटा, मैदान कटा
खेती – बारी, खरिहान कटा
दक्खिन-पुरवा, कुटिया कटि गै
लरिकइयां कै अरमान कटा
घर-गाँव समाकुल बचा बाय
दिन बीतै यही तसल्ली मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

लोगै मिलि गउवाई गावैं
आपस मा बोलैं आवं-बावं
जउने मेली बाटै कटान
अगले साली न बचे गाँव
राती मा जुगुनी जुगुर-जुगुर
ताखा मा ढेबरी लुपुर-लुपुर
हम रहेन छोट कै बात सुनी
जिउ बाहर-भीतर धुकुर-पुकुर
जल्दी ना औंघाई आवै
सोची दूरी तक राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

गाँव के गोंइंड़े सरजू माई
करैं तांडव, बनी कसाई
चुप्पे- चुप्पे, कल्ले-कल्ले
काटत आवैं वै हरजाई
हर-हर-हर-हर बोलै धारा
झम-झमाझम गिरै करारा
जनम-भूमि कै नावं-निशान
कटि गय, बहि गय, मिटि गय सारा
उच्छिन्न होय गय पूरा गाँव
वन्नइस सौ यक्क्यासी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

दक्खिन कै टोला कटै लागि
लागै रणभेरी बजै लागि
खुब उमड़-घुमड़ काटै नदिया
धारा मा जइसै धार लागि
दुश्मन कै सेना बढ़त जाय
जंगल-ज़मीन सब कटत जाय
घर-गाँव, खेत-खरिहान कुलै
देखतै ही देखत मिटत जाय
केव काव करै औ कहाँ जाय
सूझै ना अफरा-तफरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

घर पुश्तैनी नदिया काटै
कुलि देखि-देखि छाती फाटै
सनपाता सब भागैं -बिड़रैं
केऊ न केहू कै दुःख बांटै
वीपत मूड़े भीजै सबके
उजड़त घर दूरै से ताकैं
वै बान्हि करेजे पै तावा
बरतन-कुरतन लइकै भागैं
न ऊँच-नीच ना भेदभाव
सबकै घर कटै कटानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

अनजानी जगहीं गड़ा रहा
चाँदी कै रुपिया खखरा मा
वै बनिया धनी पुरान रहे
रोवैं, हेरैं, खोदैं घर मा
दीवार गिरी जब आँगन कै
खखरा देखान दौरे पकरै
करिह्याँव छाँन्हि छोटका लरिका
घिसिरावत दूर जकड़ लइगै
तू जान दिहे से का पइबा
हम बहुत कमाबै जिनगी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

खुब कटै कटान करार गिरै
घर आँगन कै दीवार गिरै
लागै कि चिउंटी के बिल मा
फरूहा – कुदार कै वार चलै
टोला कै टोला उजड़ गवा
दस-बीस बोझ मा सिमिट गवा
कोरौ औ बाँस, थाम-थून्ही
कुछ हाथ लगा, कुछ छूट गवा
पहुँची पिछवारे बा नदिया
दादा गोहराये राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

संकट कै बादर सिर उप्पर
मन मा हमरे चिंता दूसर
हम नावं लिखावै इंटर मा
कुलि छोड़ि-छाड़ भागेन पैदर
फिर वाल्मीकि इंटर कॉलेज से
नाना के घर चला गयन
कुलि हाल बतायन नानी कां
वहीँ रात भये पै ठहरि गयन
कुछ लोगन कां लइकै साथे
उठि कै चल दिहन भोरहरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

सोचै, मूड़े कै नस फाटै
रस्ता नाहीं काटे काटै
घर कइसै कही कि पहुँच गयन
देखी थै घर नाहीं बाटै
माई चिल्लाय लगीं देखतै
आंसू पै आंसू बहा जाय
‘नीबी के नीचे, बगिया मा
उजरा घर आपन धरा बाय’
कापी-किताब, बस्ता तोहार
वहिं भरा धरा बा बोरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

केतनौ हम बहि-बिलान बाटेन
तब्बौ सूदे नाहीं पइहैं
जब पेट बरै लागी कसिकै
मिनकत अइहैं मूड़े चुरिहैं
मूई हाथी नौ लाख बिकै
पैलगी बहुत सम्मान बाय
बनि जाब पुजारी मंदिर कै
घर कथा सुनाइब जाय-जाय
भागा – बिड़रा जे जात हये
फिर लउट कै अइहैं गाँवैं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

निहचिंते ससुरा बइठा बा
औ’ कहत बा गाँव भले कटिगै
घर कवन खजाना गड़ा रहा
रोना रोई जेका लइकै
बौरान हये मनई – तनई
कउनौ कामे ना आवअ थैं
बिखरा समान सब परा बाय
कुलि देखि मुसुक्की मारअ थैं
तूहूँ बेघर हमहूँ बेघर
बोलअ थैं बोली आड़े मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

One thought on “पाहीमाफी [२०] : लागि कटान, कुल बहि बिलान -१

  • May 2, 2018 at 2:38 am
    Permalink

    मेरा घर पाहीमाफी (पहिया) से उत्तर छावनी-अमोढ़ा वाली रोड पर लगभग दो किमी पहले पड़ जाता है। मेरी सामाजिक और भौगोलिक स्थिति जागरथ के समरूप ही है। इत्तिफ़ाक़, मेरा जन्मजात वजूद जागरथ जी से बिल्कुल मिलता-जुलता है। दोनों दलित पैदा हुए। जागरथ आम्बेडकरवादी और मैं मार्क्सवादी। दोनों के दृष्टिकोण में सिर्फ इतना अंतर कि वह ब्राह्मणों को दलित दुखों का पुरोधा मानते हैं और मैं ब्राह्मण जातियों में भी गरीब वर्ग को चिन्हित कर उन्हें वर्ग मित्र के लिए शिक्षित करने लगता हूँ। वह आम्बेडकरवादी हैं तो मैं मार्क्सवादी। वह ब्राह्मणवाद को भारतीय दुखों का मूल समझते हैं तो मैं पूँजीवाद को। वे दलितों को ब्राह्मणवाद के विरुद्ध तैयार करने की जुगत में हैं तो मैं मार्क्सवाद को वर्ग-संघर्ष का रास्ता मानता हुआ शोषित वर्ग को जातिवाद से बचने की तरक़ीब बताता रहता हूँ। लेकिन, सरयू नदी के प्रकोप की भौतिक दशाओं की अनुभूति जागरथ जी में भोगा हुआ यथार्थ के रूप में जिंदा है तो मैं परानुभूति का दर्द बयां करने का शाहस कर रहा हूँ।
    जागरथ ने नदी के कटान का जो ज़िक्र किया है और जिन लोगों के घर नदी में कट कर ज़मीदोज हो गए हैं, वह पीड़ा जागरथ की कविता में भोग हुआ यथार्थ के रूप में चित्रित है। वह एक असहनीय पीड़ा है। आज भी जब हम वहां से गुजरते हैं तो वह मंजर जिन्दा हो उठता है और हम खौफ से काँप उठते हैं।
    आर डी आनंद

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