पाहीमाफी [१५] : तिरिया-गाथा (२)

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग”,  दुसरका भाग , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग१३-वाँ भाग १४-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १५-वाँ भाग :

Captureई हय पाहीमाफी है १५-वां अउ तिरिया गाथा कै दुसरका भाग। तिरिया गाथा मा गाँव कै आधा दुख बरसि परा अहय। इनका पढ़त के साफ जाहिर हुअत हय कि यक्कै साथे रहय के बावजूद मरदन की दुनिया से औरतन कय दुनिया केतनी अलगि बाय। औरतनौ की दुनिया मा सबर्न औ अबर्न औरतन कै दुनिया अलगि-अलगि बाय। यहिका पढ़त के ई जाना जाय सकत हय। यहिमा ई बतावा गा बाय कि सबर्न मेहररुवै अबर्न मेहररुवन क बेहतर हालत मा बतावत हयँ। अबर्न मेहररुवै सबर्न मेहररुवन का कौनी हालत मा देखति हयँ, कौने मामिले मा बेहतर या बदतर मानति हयँ, संभव हय ई बाति आगे देखय का मिलय। उनके ‘कहन’ मा ई आवय मुमकिन हय। 

तिरिया गाथा मा औरतन के कयिउ अवस्थन कय सच कहा गा बाय। ई नाहीं कि केवल जवानिन कै दसा बतायी जाय। गेदहरा-जवान-बूढ़ : तीनौ पायदान पै खड़ी तिरियन का जागरथ जी लखे अहयँ। इन कबितक के जरिये आपौ इनका लखि सकत हयँ। 

कबिता कय यक-यक बारह-पतिया टुकड़ा अपने मा कंपलीट अहय। ऊ पूरा चित्र सामने उकेर दियत हय। यक-यक चित्र पूरी कहानी कहत देखाये। बिटिया, जवान औ बूढ़ तीनौ जिंदगिन पै अलग-अलग टुकड़य अलग-अलग कहानिव कहत हयँ। यनहीं के बीचे कबिता कय अव्वल सधानौ आपन छटा देखावय लागत हय। जयिसे ई दुइ लाइनन मा, ‘बात’ सबद से कीन खेल बढ़िया हय। ‘बात’ सबद से जुड़े मुहाबरन कय का गजब इस्तेमाल कीन गा अहय : ‘बात निकारैं बात-बात मा / बाती मा बाती कै गूझा.’ : संपादक 
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  • तियिया-गाथा : (२)

घूमौ खुब डारे गलबहियां
तुहकां देखतै परचय देहियाँ
हम खटी अकेलै काम करी
लरिका कां लिहे-लिहे कनियाँ
हेंढ़ा यस भया तुहैं पोसेन
तुहूँसे गोबरे कै छोत नीक
हम फुरै कही थै मान जाव
नाहीं माँगे ना मिली भीख
चेतौ अबहीं सौंकेर बाय
मेहरी आई बा गवने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

जे करै परिश्रम हाँड़ तोड़
वै खाय बिना मर जात रहे
जेकरे अनाज इफरात रहै
वै खाय-खाय डुडुवात रहे
जे ऊँच रहैं सिंगार करैं
घर के भीतर करियान रहैं
पर सूद चमार कै मेहरारू
खेते मा साथे काम करैं
केउ ओढ़े-बेढ़े बइठ रहै
केव धान बिठावै कनई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

ठकुराइन कै नीक बहुरिया
लाल बिलाउज धोती करिया
माथे चम-चम टिकुली चमकै
गोरहर हाथ म हरियर चुरिया
सीसा लइकै माँग सोझावैं
क्रीम-पाउडर रोज लगावैं
फरमाइस सब पूर हुवै पर
घर से बाहर निकरि न पावैं
केतना खेत कहाँ पै बाटै
जान न पावैं जिनगी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

राखैं सासू अपने कसि मां
जइसै की गाय रहै बस मा
लागै कुलि बुद्धी चूल्हा मा वै
भोजन नीक पकावैं घर मा
दिन-रात रहत अन्दर-भीतर
कुछ साँवरि भी लागैं गोरहर
देखन मा लाल गुलाब लगैं
केतनौ जंजाल रहै सिर पर
लेकिन नइहर कै नावं लेहे पै
आंसू आवै आँखी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

लेहसुवा-केरमुआ-अमलोनी
सोचिअ थै जाय साग खोंटी
तीनौ कां यक्कै मा मेराय
लहसुन के तड़का से छौंकी
हमरे यक जने तौ यस मनई
तूरैं रोजै सरगे तरई
जाई माँगी ठकुराइन से
सरसौ कय तेल एक परई
गोजई कै हथपोइया रोटी
सेंकब कंडी की आँची मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

चला हटावा मेलिया-मेटवा
खाबै ना बोलत बा पेटवा
थरिया झन-झन बाजत बाटै
छः बिटिया प पइदा भै बेटवा
बहुत अगोरिन पंडित बाबा
कइकै किस्मत से समझौता
घर मा वंश चलावै ताईं
यक बेटवा कै रहा मनौता
धगरिन ढूध पियावैं, रोवै
नन्हा – मुन्ना सौरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बेटवा भये सब सोहर गावै
बिटिया होय तौ मुँह बिचकावै
कहैं भवानी आयी बाटीं
झौवा भै खरचा करवावै
‘बेटवा होतिव खूब खियाइत
मूड़े पै बइठाय खेलाइत
हँसी-हँसी मा हँसि कै बोलिन
मरि जातिउ तौ फुरसत पाइत’
बिटिया ताकै कुछू न बोलै
भाई लादे कनियाँ मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बिटिया ! तू तनी वोनाय जाव
ओढ़ना सीयै बइठी बाटी
सूई मा धागा नाय दियौ
हमरे देखात नाहीं आंखी
ई टुटा खटोला झोल खाय
बनिकै गठरी अब ना सुतिबै
धइ दिहेन उजार-फुजार कै हम
वै बोलिहैं काने सुनि लेबै
यक नीक रजाई पाय रहेन
वोका दइ दिहेन पतोहे कां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पहिलउठा भै जुरतै मरि गै
ताना-बोली से जिउ भरि गै
यक ठू बेटवा के चक्कर मा
बिटियै-बिटिया पइदा होइ गै
दूसर मेहरी हमरी नाईं
जा लइ आवा अपनी ताईं
तू दांत चिदोरे खड़ा हया
चिल्लाई थै सुनत्या नाहीं
जाई थै बहि-बिलाय जाबै
धंसि जाबै कूआँ-खाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

होते नाहीं लरिका-बच्चा
कानाफूसी से जिउ कच्चा
सब जने कचाहिन केहे हये
दीदी-बहिनी, मरदी-मरदा
मनसेधू हमरे कहत हये
पहिरब-खाबै-पीबै अच्छा
दुनिया औलाद से पटी बाय
काहे तू करत हयू चिन्ता
हम दुवौ परानी ठीक-ठाक
दुसरे-दूसर क्यो बीचे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

चाटै गइया आपन लेरुआ
हमहूँ क् चाही येक दुलरुआ
ना जाने वै कहाँ से लाये
पाये यक ठू बच्चा परुआ
विधवा दीन-दु:खी महतारी
या तौ कउनौ रही कुँवारी
कठिन करेजे फेंके होई
गड़ही मा झाली के आरी
बहुत रह्यू औलाद कै भूखी
पाय गयन हम सेती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कही तौ माई मारी जाई
नाहीं बापू कूकुर खाई
तुंहसे काव कही अब बहिनी !
कहिकै इज्जत खुदै गंवाई
बुढ़ऊ बाहर रंग जमावैं
नीक-नीक परबचन सुनावैं
सासू राती गोड़ न मीजैं
सौ-सौ गारी, झापड़ पावैं
यक दिन तौ कपड़ा निकारि वै
खड़ा कै दिहिन ठण्ढी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

नेम-धरम से रोजै पूजा
वनके लेखे नाहीं दूजा
बात निकारैं बात-बात मा
बाती मा बाती कै गूझा
घूंघुट से बहिरे झाँके पै
डोलै लागअ थै सिंहासन
अपुवां घूमैं कोलिया-कोलिया
मेहरारुन पै पहरा–सासन
छटकत घूमत रहेन नइहरे
जेल भवा ससुरारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

सइंतौ-माजौ, चूल्हा बारौ
भन्छौ दिन भै जिउ दइ डारौ
घर कै मेहरारुन गाय-भइंस
मारौ–पीटौ खूँटा गाडौ
बिटिया बा नीक पढ़ाकू बा
दरजा मा सबसे अव्वल बा
काव कही औलाद कां अपने
बेटवा तौ गोबर-गणेस बा
खाय-पियै, डुडुवाय जाय ना
बिन मारे इस्कूले मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

सुन लेत्यू बात मोर माई
बापू से कइसै करी ढिठाई
ना छोड़वावा पढ़ै दिया हम
आगे आउर पढ़ब पढ़ाई
खबवा खाव चुपाई मारे
जाड़ हुवत बा जात्यू सोई
बिटियै जादा पढ़-लिखि लेइहैं
तौ बियाह मा दिक्कत होई
खुसुर-फुसुर माई औ’ धीया
बहसैं रात रसोई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

तू घाम-घमौनी करत हयू
बइठी बाट्यू झोंटा खोले
बड़कऊ उहै आवत बाटे
देखिहैं रहिहैं ना बिन बोले
आवा हमरे सब चला चली
दक्खिन पिछवारे की वोरी
फइलावा वहीं झुरात बाय
लंहगा–साड़ी–साया–चोली
सूदेन कै मेहरी नीक बहुत
घूमैं कुलि खेते-खेते मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

सुन्दर अंखिया यत्’तत-यत्’तत
पातर कै गठी देह गोरहर
धन देखि फलाने नाधि दिहिन
बउदहा से गाँठ जुड़ा वोकर
रोवत बा कहत बाय काकी !
कि जाब दुबारा ना ससुरे
मरि जाबै खाय ज़हर-माहुर
वै बाप बराबर हैं हमरे
समझाई थै मानत नाहीं
बहुतै डर लागत बा हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

चूल्हा पै चढ़ा रहा अदहन
देवरानी से बतियात रहेन
दलिया होयगै पातर पानी
डारै कां नोन भुलाय गयन
परसा खबवा खाये नाहीं
यक जने काल्हि रिसियाय गये
हम घंटा भर से खड़ी-खड़ी
जब खूब मनायन मान गये
पानी छुई लियौ चलौ जल्दी
ना बइठी रहौ सिवाने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

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