पाहीमाफी [१२] : जाति दंस, बड़ा कलंक

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  दुसरका भाग  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १२-वाँ भाग :

यकतनहा नीम अउर जागरथ

हिन्दी मा पिछले कयिउ सालन से दलित आत्मकथा कय दौरदौरा चलत अहय। ई चलन एतना जोरान अउर फरान कि दलित-लेखन के बहस मा आत्मकथा केंद्र मा आइ गय। खचिन्ना-अस खींच दीन गा कि ऊ दलित-साहित्यकार कउने अरथ मा जेहके लगे आत्मकथै न हुवय। यहिते यह चीज ई भै कि आत्मकथा के नाव पै यक किसिम कय ‘फॊर्म’ कय देखादेखिउ हुवय लागि। यहिमा कौनौ दुइ राय नाहीं न कि इन्हते विमर्स वाले लेखन मा बहुत आसानी भै। मुदा, रचनात्मक इलाका आहिस्ता-आहिस्ता किनरियावा जाय लाग। आशाराम जागरथ कै ई ‘पाहीमाफी’ यहि किनरियाये इलाके कय अनदेखी क लयिके सजगि अहय। जागरथ आत्मकथा के ‘फॊर्म’ कय देखादेखी करय के जगहा पै आपन नवा सिल्प ढूँढ़िन। यहिकय मतलब ई नाहीं कि आत्मकथात्मकता कय भाव छोड़ि दिहिन, बल्कि पकरे अहयँ, उल्टे औरव जरूरी काम किहिन, जौन नहीं कीन जात रहा। पाहीमाफी, भासै नाहीं, अपने सिल्प औ भीतर-बात — दुइनौ के ताईं अहमि अहय। यहि अंक क यहू निगाह से देखि सका जात हय। : संपादक
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  • जाति दंस, बड़ा कलंक

सूअरबाड़ा, उजड़ी कोठरी
चुप्पे घुसरी ग़ुरबत बुजरी
फुटही खपरी मुंह बाये परी
झिलरी खटिया कथरी-गुदरी
चूल्हा आगे टुटही खांची
खांची मा आमे कै पाती
डुडुवायं बिरावैं माँग खायँ
मंगता-जोगी औ’ सन्यासी
कूकुर-बिलार घर ना झाकैं
मुसरी घुसरैं ना डेहरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

दिन-रात खेत मा खटत रहे
वै बड़न कै सेवा करत रहे
वइसै तौ देश अजाद रहा
पर गाँव कै सूद गुलाम रहे
पैलगी दूर से करत रहैं
परछाँह बचायिके चलत रहैं
बाभन-ठाकुर केव आय जाय
खटिया पर से उठि जात रहैं
जे नीक कै कपड़ा पहिर लियै
ऊ खटकै सबकी आँखी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

मन ही मन मा सोच विचार
बहुत सहैं वै अत्याचार
सेंत-मेंत मा काम करैं बस
हरवाही पै जियैं चमार
सुख कै तूरि ना पावैं कौर
गाँव से बाहर वनकै ठौर
खाय बिना चाहे मर जांय
केहू न झाँकै वनकी ओर
करै मजूरी गाँव मा केऊ
दिल्ली केऊ बम्बई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

उखुड़ी हमार जे तुरअ थै
जानी थै नावं बाय मुँह मा
हम पँहटत हई कऊ दिन से
रंगे हाथे पकरब वनकां
पकरे, ‘हड्डहा’ चमार मिला
खेती-बारी नाहीं वकरे
ऊ बोला काका माफ करौ
झाँवर कै रोग बाय हमरे
कुछ बूढ़ – पुरनियां कहत हये
सोवा गन्ना के खेते मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जेकरे खेती वोकरे ऐंड़
खाली बइठ रखावै मेंड़
उखुड़ी छोलै लढ़िया लादै
मजदूरी मा खाली गेंड़
दुई रुपिया औ खरबचाई
दिन भै खोदैं वै बिरवाही
लत्ता-लत्ता लरिके तरसैं
बारहो मास करैं हरवाही
यक दिन जो नागा होय जाय
गारी पावैं सेती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

कतहूँ-कतहूँ फुंसी-फोड़ा
मूड़े मा ढीलौ-लीख भरा
करिया धागा गटई पहिरे
तन पे झिलरा चीकट कपड़ा
देहीं मा पाले दाद-खाज
किस्मत का कोसै मुस्कियाय
यक बिगहा मुँह फैलाय लियै
जब खबर-खबर खजुली खजुवाय
माई तू काहे जनम दिहू
ई जात-पात की माटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

सूकन-संती-गोधी-लोकई
औ कुष्ठ रोग पीड़ित तोखई
वै मरा जानवर निकियावैं
गाँवै कै नीबर औ गोगई
ना सीधे मुँह केव बात करै
केव देखतै ही अपमान करै
मेहरारू-बिटियन कै इज्जत
हरदम ही दाँव पे लाग रहै
कामे-काजे काटैं सूअर
तब उड़ै भोज चमरौटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

टुटहा-जस्ता दुइ-यक बरतन
ज्यों साँझ ढलै बाजै खन-खन
जब खाय का घर मा ना आटै
तब खाँय मरा डांगर जबरन
खरिहान कै गोहूँ खाय-खाय कै
बैल जो गोबर करत रहे
वोका बटोरि सुखवाय लियैं
फिर पीट-पाट कै पीस लियैं
दुःख-वीर दलिद्दर दलित रहे
सब खात रहे मजबूरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

परै लाग पेटे मा दाना
समझौ सूदे भये उताना
तनिकौ उज्जर कपड़ा देखैं
बड़े-बड़कवै मारैं ताना
हाल-चाल कुलि ठीकै बाय
बीतै समय जवन कटि जाय
‘घातै घात ‘चमरऊ’ पूछैं
मालिक पड़वा नीके बाय’
सुनेन बेमार रहा हम आयन
दउरा हाली-हाली मा 
यकतनहा  कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

नीक-सूक बेसन कै चिल्ला
खाय न झबरा करिया पिल्ला
घुसा रहै बिस्तर के भीतर
हमरे बहुत लाग बा हिल्ला
नोन-पियाज से रोटी खाई
नाहीं तौ उपास रहि जाई
आगे नाथ न पीछे पगहा
बस पिल्ला के दादा-माई
दूनौ जूनी खाय क् मिलअ थै
बन्दीघर सरकारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

हम तौ ठहरेन खेतिहर मजूर
दुसरे सदियन कै छुआछूत
ग़ुरबत मा रोजै गम खाई
तोहरे घर धन-दौलत अकूत
देहीं खुमार मन मा गुबार
अललाय खमोशी चढ़ि कपार
आँखी से टप-टप खून चुवै
ऐ ! कब्जेदारौँ, खबरदार
अपने राही तू मगन रहौ
पीछे मुड़ि देख्यौ ना हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

हीलै ना डोलै रहै गड़ा
जइसन खेते मा ऊढ़ खड़ा
सुध-बुध खोये कुछ उड़ा-उड़ा
ऊ सुवर चरावत रहा खड़ा
अन्नासैं कां गरियाय दिहिन
देखतै चन्दन टीकाधारी
तू हया ढिठान बहुत ‘सरऊ’
मन कहत ब लाठी दइ मारी
कउने वोरी से जाई हम
परछाहीं पूरे राही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

रसरी जरि गै अइठन ना गै
ना अबह्यूं अकिल ठेकाने भै
भुन-भुनभुन-भुनभुन मन ही मन
बोलै – बतुवाय – सुनै अपूवैं
बउदहा तोर बड़का लरिका
लूला – लंगडा बाटै छोटका
पूरे जवार सन्नाम बाय
बिटिया कां छोड़ि दिहिस मरदा
ई जात-पात औ’ ऊंच-नीच
चाटा लइकै तू घर हीं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

तू बरा रहौ बरियान रहौ
जाती पै खूब गुमान करौ
मनइन के बीचे हम रहिबै
तू ऊँच रहौ सैतान रहौ
खुब पढ़ौ पुरैहिती घोंट-घोंट
बेटवा हमार बी.ए. मा बा
तू उड़ा रहअ थौ का जानौ
बड़कउना दुबई मा गै बा
उजियारे कै आदी मनई
देखते नाहीं अन्हियारे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

परै मुरदनी चमरौटी मा
कउनौ फरक न बभनौटी मा
केव न जाय फुकावै साथे
मानौ वै ना हये गाँव मा
आपन काम करैं सब सारा
ताकैं बस, कस लियैं किनारा  
बहुत हुवै तौ बोल दियैं कि 
सीधा-सादा रहा बेचारा
बैर-भाव न किहिस केहू से
जुटा रहै बस कामे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बड़कन मा केऊ मरि जाय
सूद-अछूत  फुकावै जायँ  
लामे खड़ा रहैं चाहे वै
लेकिन मूड़ गिनावै जायँ
यक्कै गाँव मा येतना जात
देस कै काव करी हम बात 
सब कै आपन रीति-रिवाज़
हर जाती मा यक ठू जात
जात-पात मा अइसन जीयैं
जइसै मूस रहैं बिल मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गाँव के बाहर बसैं अछूत
कुछ गोरहर कुछ करिया भूत
जइसै तइसै करैं गुजारा
लादे मूड़े बोझ अकूत
कुआँ से पानी भरैं न पावैं
दुसरे गांव से ढोय क लावैं
काम करैं बन मनई-तनई
तब सबकै मनई कहलावैं
जब मागैँ मनई कै दर्जा
गिनती नाहीं मनई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बोले गोगई मन बा खट्टा
पानी कै बा बहुत समिस्या
ईंटा पाथै हम जानिअ थै
कुआँ खोदाइब कच्चा-पक्का
सबकै सब मनसाय गये जब
कुछ भलमनई साथ दिहिन तब
देखतै देखत बनिगै कूआँ
जरवइयन कै चेहरा धूआँ
सबसे खुस मेहरारू – लरिकै
धूम मची चमरौटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

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