‘पाहीमाफी’ [३] : मन लरिकइयाँ कै नरम-नरम

16002909_368661613493762_7146674138761624111_nसिसिलेवार ढंग से पोस्ट कीन जाति, आशाराम ‘जागरथ’ कय रचना, ‘पाहीमाफी’ कय ई तिसरका हिस्सा आपके सामने रखा जात अहय। यहिके पहिले केरी कड़ियन क पढ़य खातिर यहिपै क्लिक करैं : “पहिला भाग” ,  “दुसरका भाग” । तौ आज यहि तिसरके हिस्सा कय पाठ कीन जाय औ अपने बिचार से अवगत करावा जाय। : संपादक
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मन लरिकइयाँ कै नरम-नरम

गोरहर झुर्री करिया गोदना
आजी कै लम्बा डील-डौल
बित्ता से बेसी यक घेंघा
गटई मा लटकै गोल-गोल
झिर्री यस धोती मारकीन
पहिरे कमीज हरियर-हरियर
चाँदी कै हँसुली पौवा भै
घेंघा म् बाझै करिया-उज्जर
महकै घिउ-दूध-दही गम-गम
बइठी जब वनके गोदी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बगल धरे कजरौटा-डोकवा
बूढ़ी माई लगावैं बुकवा
कहैं दूध ई गुट कै जाव
नाहीं तौ आ जाई बिगवा
‘कीचर-काचर कौवा खाय
दूध-भात मोर भैया खाय’
दइ कै काजर दूनौ आँखी
एक डिठौना दियैं लगाय
जुरतै भाग हुवां से जाई
खेली धूरी-माटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गोड़ मोड़ि आजी बैठावैं
घंता-मंता खूब खेलावैं
गोदी मा दुपकाय लियैं औ
पौंढ़े-पौंढ़े गीत सुनावैं
घोरतइयाँ तांई नंगाई
डांट दियैं तौ चुप होय जाई
सुबुक-सुबुक कै बीदुर काढ़े
रोय-रोय हम करी ढिठाई
गरम जलेबी छनै छना-छन
सपना देखी राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

ऊ दिन अबहूँ बाटै याद
मेला देखै कै फरियाद
घर मा फूटी कौड़ी नाही
रोई हम समझी न बात
ना रोवो अब जाओ मान
नाहीं तौ कउवा काटी कान
कनियाँ लइकै बूआ हमकां
उंगुरी-सीध देखावैं चाँद
‘लकड़सुन्घौवा पकरि लेअ थै
मेला वाली राही मा’ 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गाँव म् जब केउ परै बेमार
होय जरूरी काम अकाज
खाय-खाय खरखोदवा घर मा
बइठे रोग ठीक होय जाय
लेकिन अगर रोग गंभीर
गलि कै ठठरी हुवै सरीर
कहाँ से लावै पइसा-कौड़ी
दवा से सस्ता मरै फकीर
कहँरै अउर महिन्नौँ झेलै
खटिया लधा ओसारे मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

हमरी आजी जब मरी रहीं
घेंघा मा पाका भवा रहा
कउनौ ना दवा–दवाई भै
बस खाली सेवा भवा रहा
भैया रहे ‘राम लौट’ बड़के
पेटे मा दर्द उठै वनके
रहि-रहि चिल्लायं रात भै वै
रोवैं माई बइठे–बइठे
चलि बसे रोग पथरी लइकै
जिनगी के सोरह साली मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

तप्ता बारि सब सेकैं आँच
हम खेली औ खाई डांट
खूब लगै कसि कै जब जाड़ा
कट-कट-कट-कट बोलै दांत
पैरा बिछै के ओढ़ी कथरी
जाड़ लगै होइ जाई गठरी
टी० बी० रोगी माई खांसैं
पूरी देहियाँ खाली ठठरी
सिकहर टांगी रोटी खाई
स्वाद रहा खुब बासी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

मासा लागैं सोय न जाय
काटैं उडुस बहुत खजुवाय
यक्कै बेना के-के हाँकै
लागै गरमी सहि न जाय
उठी रात खुब पानी पीई
छींटा मारि बिछौना भेई
कबहुं-कबहुं तौ रात म उठि कै
फरवारे मा जाय कै सोई
ढुरुक-ढुरुक कै चलै बयार
रहि – रहि लागै देहीं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

सूरज का लुकुवावै बदरी
बहुत जोर जब घेरै कजरी
बरसै तड़-तड़, चूवै छप्पर
अरगन टाँगी भीजै कथरी
दस-दस दिन बरखा न जाय
सूखै ना कपड़ा गन्धाय
कीच-काच मा आवत जात
गोड़ कै उंगुरी सरि-सरि जाय
चुवै ओरौनी झर-झर-झर-झर
उठै बुलबुला पानी मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गौधुरिया घेरै अन्हियार
कंडी लइकै माँगी आग
तान टेर बोलै करकच्ची
हुआँ-हुआँ चिल्लाय सियार
जुगुनू उडै  गिनी हम तरई
बदरा लागै भागत मनई
झूरा परि गै खतम अनाज
सुनतै खून घटा यक परई
पढ़ी तो ढिबरी बुत-बुत जाय
तेल दिया न बाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

एक रात अन्हियारी घरिया
गाभिन भइस बियाइस पड़िया
जुगुर-जुगुर ढिबरी मा लौकै
नान्ह कै लेरुआ करिया-करिया
खुटुर-पुटुर कुछ साफ-सफाई
टूटी नींद नाहिं फिर आई
पेउस दूध गारि बल्टी भै
इनरी ढेर बनाइन माई
नेसुहा कोयर बालैं दादा
लाय हरेरा खाँची मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

सुबह-सुबह मकलाय पड़उवा
दूध पियै घरिया मा लेरुआ
घड़- घड़- घड़- घड़ जाँता बोलै
कड़िया मा घप-घप्प पहरूवा
सानी-पानी, हौदी-नादा
तापैं तपता बारे आजा
उखुड़ी छोलै कां गोहरावैं
पहँटैं हँसिया अउर गड़ासा
भुजिया धिकवैं बूढ़ी माई
बुज्जा फूलै हांड़ी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

यक ठू गीत सुनावत बाटी
वोकर अरथ बतावा साथी
वोका-बोका तीन तिलोका
लइया लाठी चन्दन काठी
अमुनिक जमुनी पनिया पचक
खेलैं कुल लरिके मटक-मटक
चिउँटा-चिउँटी, हाथी- घोड़ा
तू का लेबा झट-पट बोला
हाथ पे हाथ धरे तर ऊपर
मूड़ भिड़ाये मूड़ी मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

होत भिनौखा यक ठू भाट
खझरी बजा के गावत जाय
‘उवा सुकौवा भय भिनसार
टटिया खोला हे जजमान
सुन्दर मौनी सुंदर दान
सुन्दर पूत दियैं भगवान’
सोची काहे ई मांगत बा
हट्टा-कट्ठा एक किसान
दादा बोले तू न बुझबौ
भिच्छा यकरे जाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

नियति-स्थिति औ लाचारी
लियै परिच्छा बारी-बारी
पीकै घूँट खून कै जब-तब
सोची-समझी अउर विचारी
ऊँच-नीच के दिहिस बनाय़  
धन-धरती कां बाँटिस नाहि
काम करै सगरौ दिन केऊ
केऊ खाली बइठे खाय
कबहूँ कहूँ मिलै ना उत्तर
ढूढ़ी रोज किताबी मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

unnamedपूजेन पहाड़ तब्बौ ना पायन
काव मिला जब हम सधुवायन
कइसे कही झूठ बा दुनिया
दूइ दिन से कुच्छौ ना खायन
‘गीता’ बोलै बस काम करा
फल-वल कै चिंता छोड़ि चला
वहि राही चले बाप – दादा
भुखमरी औ छूआछूत मिला
भेड़िया – धसांन मा ना रहिबै
कूदब ना कूआँ – खाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

 __आशाराम जागरथ

[जारी….]

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