सिंगार-सोरठा__कवि रहीम

 अवधी क जिन कवियन पै नाज है उनमा कौनौ दुइ राय नाहीं है कि एक कवि रहीम अहैं। रहीम की क्रितियन मा एक ‘सिंगार-सोरठा’ है जेहिके तहत अबहीं ले कुल छः सोरठा मिलि सका अहैं। इन सोरठन मा सिंगार रस कै समाई है, साथेन कवि के कल्पना कै सिंगारी छौंक जहाँ-तहाँ मौजूद है। यै छवो सोरठै हियाँ प्रस्तुत कीन जात अहैं। इनकै मतलबौ भरसक बताय दिहे अहन्‌। : संपादक
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सिंगार-सोरठा__कवि रहीम  

गई आगि उर लाय, आगि लेन आई जो तिय।
लागी नाहिं बुझाय, भभकि-भभकि बरि बरि उठै॥१॥

नायक नायिका के प्रेम के बसीभूत होइके कहत अहै कि जौन नारी हमरे घरे आगि लियै आई रही ऊ हमरे हिये मा आगि लगाय के चली गै। प्रेम कै चिनगी डारि गै।  अस आगि लागि कि अब ऊ बुझाति नाहीं, उल्टे भभकि-भभकि  के बरै लागति है।

तुरुक-गुरुक भरिपूर, डूबि डूबि सुरगुरु उठैं।
चातक-जातक दूरि, देह दहे बिन देह को॥२॥

[तुरुक-गुरुक = तुरकन कै गुरू यानी पीर, हियाँ मतलब है पीर (पीड़ा) । गुरगुरु = देवतन कै गुरू यानी ब्रिहस्पति, हियाँ मतलब है ‘जिउ’ । चातक-जातक = चातक के बोले पै ‘पी पी’ कै आवाज, हियाँ मतलब है ‘मनसेधू’ (पति) । बिन देह को = बिना सरीर कै, हियाँ मतलब है ‘कामदेव’।]

बिरह मा परी नायिका अपने सखी से कहति है, हमरे पूरे देह मा बहुत पीरा अहै, यहि पीरा (के समुद्र) मा हमार जिउ बार बार डूबत है। (यहि समय) हमार मनसेधू हमसे दूर अहै औ ई कामदेव हमरे देह का दहे(जलाये) जात अहै।
यहि सोरठा मा कूट-भासा कै प्रयोग कीन गा है।

दीपक हिये छिपाय, नवल बधू घर लै चली।
कर बिहीन पछिताय, कुच लखि निज सीसै धुनै॥३॥

यक नयी बधू दिया क हिये के लगे-लगे छिपाये अपने घरे चली।  यहि दसा मा कुचन क देखि के दिया रहि रहि के पछिताय लाग, सिर धुनै लाग कि कास! हमरे लगे हाथ हुअत तौ हम इन कुचन का  टोय लेइत, आनंद पाइत।

पलटि चली मुसकाय, दुति रहीम उपजाय अति।
बाती सी उसकाय, मानो दीनी दीप की॥४॥

कवि रहीम कहत हैं कि जब ऊ नायिका पलटि के मुसकियाय के जाय लाग तौ मानौ अपनी आभा से, दुति से दिया के बाती क औरौ उसकाय दिहे हुवै, तेज कै दिहे हुवै!

यक नाहीं यक पीर, हिय रहीम होती रहै।
काहु न भई सरीर, रीति न बेदन एक सी॥५॥

प्रीतम के हिये मा यक न यक पीर होतिन रहति है। ई पीरा काहे नाय देह के पीरा की नाईं भै! जौन हमेसा सब केहू के देह मा एक्कै नाईं हुअत है! ई (हिये कै) पीरा भला  कैसे बताई जाय, कैसे बुझाई जाय!

रहिमन पुतरी स्याम, मनहुँ जलज मधुकर लसै।
कैधों सालिगराम, रूपे के अरघा धरे॥६॥

नायिका के सफेद आँखिन केर करिया पुतरी बहुतै सुहाति अहै। मानौ सफेद कमल पै भौंरा सोभा दियत हुवै! या फिर चांदी के अरघा मा सालिगराम धरा (सोभायमान) हुवैं!

One thought on “सिंगार-सोरठा__कवि रहीम

  • October 15, 2012 at 2:55 pm
    Permalink

    फेसबुक पेज पै एक संबाद भा रहा जेहका हियां रखब ठीक होए..

    Salman Khursheed >>
    Adarneey Amrendra Nath Tripathi Ji Apko Ye Sare Sorthey Kahan Se Mile — Mai Kuch Janna Chahta Hun Agar Aap Es Vidha Ke Vyakaran Se Parichit HaiN To — MaiN Kavy Ki Es Vidha Ke Vyakaran Se Parichit Nahi HuN — Kintu Kavy Ki Dusrii Kuch VidhaoN Se Parichit HuN — Es Vidha Se Aparichit Hote Huye Bhi — swavivek Ko Adaar Maankar MaiN Ye Kahena Chahta HuN Ki Shayaad Ye Sorthey Jo Ki Es Link Per Maojood HaiN — In Men Shayaad ShabdoN Ke Esthaan KisnhiN KaranoN Se Pariwartit Ho Gaye HaiN —- Mere Galaat Hone Ki Paryaapt Sambhavna Hai Sir — Qki MaiN Keh Chuka HuN Ki Kavy Ki Es Vidha Ke Vyakaran Se MaiN Parichit NahiN HuN — Mere Es Comment Ko Mere Shanka Samadhan Ka Ek Prayatn Maatr Samajhte Huye — Kripya Mera Marg Darshan KareN —- Dhanywaad Sir —

    Amrendra Nath Tripathi >>
    Salman Khursheed : भाई, आपकै सवाल करब नीक लाग। यहि छंद – सोरठा – के बारे मा यहि लिंक पै जाइके पढ़ा जाय। लिंक यू रहा :
    http://www.anubhuti-hindi.org/kavyacharcha/Chhand.htm
    जहाँ तक सब्दन के हेर फेर कै बाति है, तौ भइया, हम जौने किताब से लिखे हन्‌ वहिमा ऐसहीं लिखा है। यहिसे हम सहमतौ अहन्‌। किताब कै संदर्भ अस है:
    रहीम ग्रंथावली/देशराज भाटी/अशोक प्रकाशन/पृ. २७१-२

    अब हम अपने वारी से कुछ कहा चाहब। देखौ जब रहीम लिखत रहे तब कै भासा उहै नाय रही जौन आज कै अवधी अहै। रहीम का जनी कौनी लिपि मा लिखे रहे होइहैं, ऊ नागरी रही या फारसी? कुछ निस्चित कहाँ। जे लिपिबद्ध किहिस ऊ अपने लिपि औ अपने प्रभाव मा लिखिस होए। जैसे कबीर के दोहन कै भासा से ताल्लुक कयिउ रूप मिलत हैं अइसनै रही्मौ के रचना के संदर्भ मा समझौ। मात्रा कै कमी-बेसी तौ इन मध्यकालीन कवियन मा मिलिन जात है, जैसे तुलसी की चौपायिन मा कहूं कहूँ सोरह की जगह पंद्रह या सत्तरह मात्रा मिलि जइहैं। यक बात इहौ कि सबके उच्चारन कै आपन तरीकौ हुअत है, उनही हरफन का केहू गझिन कैके पढ़त है, केहू बिरर।

    सुक्रिया!

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