नोट्स : कवि ‘उन्मत्त’ कै कविता-१

आजादी के बाद कै अवधी कविता क निखारय संवारय मा प्रतापगढ़ के अवधी कवियन कै बहुत योगदान अहै. यहि दौरान यहि इलाका मा कलम कै धनी कयिउ कवि भये, जइसे आद्याप्रसाद ‘उन्मत्त’, जुमई खाँ ‘आजाद’, ओंकारनाथ उपाध्याय, अनीस देहाती, निर्झर प्रतापगढ़ी..वगैरा वगैरा. इन सब कवियन कै आपन आपन बानी-बास अहै मुला सबकी कविता मा बरोबर मौजूद बात यू है कि सब लोकजीवन क्यार कवि हैं औ सबकर कविताई मा किसान, गाँव, पैसरम आद बिसय छावा हैं. उन्मत्तौ जी कै कविता इन बिसयन से रूबरू अहै. खुद उन्मत्त जी अपनी कविता के बारेम कहे अहैं – ”हमरी कविता के विसय देसभक्ति, बीरता, पयसरम, किसान औ मजदूर सदा से रहेन औ अहैं. हमार कविता इहीं बिसयन पर होथै.” यहिका उन्मत्त जी के काव्य-संवेदना कै तिरपाल माना जाय जौन उनके पूरे काव्य पै ताना मिले। 

खड़ी बोली-हिन्दी के कवियन कै परख करत के यक खास बिंदु कै चर्चा अक्सर हुअत है कि कवि केरि ‘प्रतिबद्धता’ केस है? प्रतिबद्धता क्यार मतलब भा कि कविता म कवि कौनी तिना के मनइन के साथ आपन तरफदारी देखावत है, केकरे बीच अपनेक पावत है, केकरे ताईं आपन जिम्मेदारी समझत है, केकरे इर्द-गिर्द आपन काव्य-संवेदना रचत है! अवधी, भोजपुरी आद देसभासय आम जन कै भासा हुवैं. भाखा हुवैं, यहिलिये भाखा कवि कै प्रतिबद्धता सहजय आम जन के लिए हुअत है. भाखा कवि कै कविता-यात्रा आम जन के दुःख-दर्द, सुख-संतोख, रहन-सहन, भाव-सुभाव के बीच पूरी हुअत है. यहि संवेदना केरी आम राह पै करोड़न ‘दोख-दुःख-दारिद-दावा’ से पीड़ित अहैं. खड़ी बोली-हिन्दी के कवि के सामने दुविधा रहत है, जेहिका कवि मुक्तिबोध ठीकै कहिन – ”क्या करूं, कहाँ जाऊं / दिल्ली या उज्जैन!” भाखा कवि गंवार है, दिल्ली वहिकै जगह है नाही औ उज्जैनौ वहिके लिए दूरै परत है. देखय म भले भाखा कवि कै दुनिया ओतनी लम्बी-चौड़ी न देखाय मुला ऊ अपनी ग्राम-भासय म बामन के नान्हे-नान्हे डगन से बहुत कुछ नापि लियत है, यहि लोक से लैके सरग तक! 

“सूरसती कै मंदिर सगरौ गाँवै-गाँव मदरसा, 
बही ग्यान कै गंगा लखि के गउंवा कै मन हरसा, 
रात बनी चांदी कै दिनवा लागै कंचन बरसा, 
गउंवा के ई रूप देखिके देवतन कै मन तरसा, 
      डोलि गवा इन्नर कै मनवा थिरकन लागे पाँव, 
      सरग से बढिके लागै गाँव.” 
(कविता : ‘सरग से बढिके लागै गाँव’/कवि : उन्मत्त) 

गौर करौ तनी कि भाखा कवि के ग्राम बरनन  अउर खड़ी बोली के कवि के ग्राम बरनन मा का अंतर है! खड़ी बोली कै कवि गांव का जादातर टहरू-घूमू निगाह से देखत है, परजटक की निगाह से। वहिकी कविता मा गाँव केरि उड़न-छू तस्बीर देखात है। कयिउ बार तौ बनावटी। भाखा कवि गाँवै कै हुअत है, गाँवै की ताईं लिखत है, यहिलिये वहिकी कविता मा गाँव केरि भरोसेदार, जमीनी, सिलसिलेवार, आत्मीय अउर भरी-पूरी तस्बीर पेस हुअत है। खड़ी बोली कै कवि कहत है, “कहीं लौंकियां लटक रही हैं / काशीफल कूष्मांड कहीं हैं!” यहि कवि क गाँव केरि झोंपड़ी के ऊपर कै कोहड़ा-लौंकी तौ देखात है मुला झोंपड़ी के भीतर कै दुनिया नाय देखात। जबकि भाखा कवि यहि झोंपड़ी मा पैदा भा है, यही के भीतर रहिके पला-बढ़ा है, अपनी जिंदगी मा संघर्स कै चेतना-चिनगी हियैं से पावत है! यहीलिये ललकारय औ भिड़य की ताकत के लिये अपनी झोंपड़िन कै रिनी है: 

“फूस  की  मड़ई  मा  बनि  बारूद  हम पैदा भये,
आगि देखी तौ भभकि के बरि न जाई, का करी!”
(गजल : का करी / कवि : उन्मत्त) 

_____जारी।

3 thoughts on “नोट्स : कवि ‘उन्मत्त’ कै कविता-१

  • September 27, 2012 at 10:10 am
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    सही कहेन भइया … मुला गांवन कै गंवई तासीर धीरे धीरे बदलत जाति अहै। और वहिकर परभाव साहित्य औ कबिताईउ पै परब स्वाभाविक बा… बाकी तौ कथरी तोहार गुन ऊ जानय जे करय गुजारा कथरी माँ

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