कविता : हम का पढ़उबै (निजार कब्बानी)

Nizar Qabbani

कविता : हम का  पढ़उबै  (निजार कब्बानी)

हम का पढ़उबै 
तुहैं प्रेम-पोथी !/? 
        मछरिया क तैरै 
        भला के सिखाइस 
        चिरैया क बिचरै 
        भला के बताइस. 
हम का पढ़उबै 
तुहैं प्रेम-पोथी !/? 
        अपनेन भरोसे 
        पनिया म लहरौ 
        अपनेन भरोसे 
        अकसवा म छहरौ. 
हम का पढ़उबै 
तुहैं प्रेम-पोथी !/? 
        किताबै सिखाइन 
        कब ढाई-आखर? 
        तारीखी आसिक 
        भये  हैं निरच्छर. 
हम का पढ़उबै 
तुहैं प्रेम-पोथी !/?

[ मूल : निजार कब्बानी केरि  कविता / अनुवाद : अमरेन्द्र ] 

4 thoughts on “कविता : हम का पढ़उबै (निजार कब्बानी)

  • June 27, 2012 at 8:41 pm
    Permalink

    बहुत सारी बधाइयाँ बहुतै नीक लिखा गवा है

    Reply
  • June 28, 2012 at 11:36 pm
    Permalink

    हम का सिखइबे होशियारी तोहिका,
    जनमैं ते पैदा भवा तू कलंदर !

    …बहुतै बढ़िया !

    Reply
  • August 14, 2012 at 6:57 pm
    Permalink

    कौन सन्दर्भ माँ लिखा गा , येही केर विश्लेषण होय का चाही .

    नान्क्यार बच्चा पढियें तो समझियें के पढ़े के कौनौ जरूरत नहीं है ,
    सबही कुछ हम माँ के पेट से लावा अहीं .

    औ एक बात जौन उधारण हियाँ देहें हैं पंछी आदि क्यार ,
    इन्सान और प्राणी माँ बुद्धि केर फरक है .

    साहित्यकार कुच्छो लिख सकित , ज्ञानी होय का अभ्यास लागत है .

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published.