अकेलै बढ़ौ हो!

कविवर रवींद्र नाथ टैगोर कै ‘एकला चलो रे’ मनै-मन बहुत सालन से गुनगुनात रहेन। मन का आसा से भरै वाला ई गीत हमैं सुकून दियत है, अइसे बहुतन क दियत होई। आज यहिका मनोज जी के पोस्ट पै जाइके अर्थ से तान भिड़ाइ के सुनेन, किसोर कुमार साहिब की आवाज मा। मन मा आवा कि लाओ यहिकै अवधी अनुवाद करी। जौन बनि परा किहेन। अब पढ़ैया लोगै बतावैं कि केतना बनि पावा है! 

अकेलै बढ़ौ हो!

केउ न सुनै जउ पुकार,
अकेलै बढ़ौ हो!

केउ कहै-सुनै न कुछू,
मुँह फिराइ लेइ।
अस अभागि जागि जाइ,
भय दिखाइ देइ।
अपने मुँहे अपन बाति,
मन मा गहौ हो!
..अकेलै बढ़ौ हो! 

डगर-डगर काँट भरी,
केऊ नहीं पास।
अस अभागि जागि जाइ,
दूर जाँय खास।
राह-राह, काँट-काँट,
रउँदि चलौ हो!
..अकेलै बढ़ौ हो! 

जउ अँजोर केउ न करै,
स्याह राति होइ।
अस अभागि जागि जाइ,
बवंडर झँकोइ।
हिये पीर-अगन कइ,
अँजोर करौ हो!
..अकेलै बढ़ौ हो!

[मूल(बांग्ला) – रवींद्र नाथ टैगोर, ‘एकला चलो रे’ / अनुवाद(अवधी) – अमरेंद्र]

4 thoughts on “अकेलै बढ़ौ हो!

  • February 27, 2012 at 4:06 am
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    अमरेन्द्र भाई आपने कमाल कर दि है। इस में गेयता भी बनी हुए है और भाव भी, अद्भुत!

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  • February 27, 2012 at 12:05 pm
    Permalink

    बहुत खुबा ! अब एक गावे के तैयारी करी हमते सब !!!
    मज़ा आय गवा
    ऐसें क्रिया कलाप और सच्चे प्रयत्नं से अवधी के खज़ाना समृद्ध होए !!! वाह !

    Reply
  • March 15, 2012 at 9:57 am
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    वाह !
    न जाने कैसे सरक गयी थी यह प्रविष्टि आँख से – यूँ तो यह गुमसुम एकाकी मन इतना सजग तो रहता है कि आपकी प्रविष्टि न छूटे!

    वैसे खूब रंगत पा गया है यह ठौर ! शुभकामनाएँ।

    Reply

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