कबिता : “टिक्कुल बाबा”(कवि: त्रिलोचन शास्त्री)

 खड़ी बोली हिन्दी मा ढेर कुल्ले कबिताई करै वाले वासुदेव सिंह ‘त्रिलोचन शास्त्री’ कै गिनती समकालीन अवधी कवियन मा बड़े गरब से कीन जात है। त्रिलोचन जी कै जनम २० अगस्त १९१७ मा जिला सुल्तानपुर/अवध के चिरानी पट्टी/कटघरा गाँव मा भा रहा। तमाम दिक्कतन कै सामना करत १९३६ मा कउनउ जतन संसकिरित मा ‘शास्त्री’ डिगरी लिहिन। त्रिलोचन कै साहित्तिक सफर पत्रकारिता से सुरू भवा अउर आगे हिन्दी साहित्त के तीन ‘प्रगतिशील’ कवियन मा यक खम्भा माना गये। यहीते इनकी अवधी कवितायिउ मा तरक्की पसंदगी लाजमी तौर पै देखात है। छुटपुट अवधी कविता लिखै के साथेन त्रिलोचन अवधी मा यक तगड़ी रचना ‘अमोला’ लिखिन जेहिमा उनकै २७०० बरवै यकट्ठा हैं। अवधी माटी कै हीरा त्रिलोचन ९ दिसंबर २००७ क दिवंगत भये !

तिलोचन जी कै मुक्तछंदी कबिता “पाँचू” आपके सामने पहिलेन रखि चुका हन, आज ई कबिता “टिक्कुल बाबा” हाजिर है:

 कबिता : “टिक्कुल बाबा”

ओहि दिन

टिक्कुल बाबा

चउकी पइ बैठा रहेन

हमहूँ ढुरकत ढुरकत

एक ओरि बैठि गए।

 

बाबा अकेलइ रहेन

करिया तिलकू बिकरमा

अवर लड़िके

कितउ भित्तर बखरी मँs

कितउ कओनेउ कामे से

अन्तहि कतहूँ गs होइहैंइ।

 

बाबा उदास हम्मइँ जानि परेन

एसे हम जाइ परे

दरिआए

बोले नाइँ।

 

उमरिउ हमारि सात आठइ

के बीचे तब रही होए

एतनी बुधि रही

कब बोलइ कब चुप रहइ।

 

बाबा बड़ी बेरि ले

चुपान रहेन

कजनी काउ गुनत रहेन

एक ठि लंबी साँसि लिहेन

बोलेन – ‘बासुदेव

जा चिलम चढ़ाइ ल्यावा।’

 

हम तमाखू गिट्टी चिलम म भरे

भित्तर गए

कंडा कइ निद्धू आगि राखी

खुलिहारिके बोरसी से लिहे

अवर राखी झारि झारिके

आगि चिलम म भरे

हेठे से फूँक मारि मारिके

बची राखी बहिराए

आए तउ बाबा के हाथे

हुक्की रही पहिलेह से

चिलम हमरे हाथे से

लेइ लिहेन।

 

नियाली नरिअरी म लगाइके

पुड़ पुड़ सुरकइ लागेन

धुआँ एहर ओहर उड़इ लाग

हम फरकहँते बइठि गए।

 

बाबा एक बाक कहेन –

‘बासुदेव, काल्हि कटघरा ग रह्यs’

हाँ बाबा

हमिआने हम

बाबा पुड़ पुड़ कइके

फेरि कहेन – ‘रनधीर के

दुआरेउ का ग रह्यs’

ग रहे, हम बोले।

 

बाबा तमाखू पिअत पिअत

मुँह उठाइके हम्मइँ लखत

पूछेन – ‘ओकरे लोटा से

पानी उहाँ पिए रह्यs’

पिए रहे, हम कहे।

 

बाबा फेरि हुक्की पुड़पुड़ाइके

सोधाएन – ‘अवर के के रहा’

करिया तिलकू धरमू ताली

बिकरमा सब साथ साथ रहेन

हमरे सब जोर जोर से पिआसा रहे

दुआरे इनारा गगरा लोटा उबहनि देखे

फेरि सब जन पिअत गए।

 

बाबा से हुक्की बतिआवइ लागि

ओकर ओसरी कइके

फेरि हमरी ओरि भए पूछेन –

‘सब पिएसि उहाँ’

हम कहे – एक ताली नाइँ पिएन

अवर सब पिएसि इ

बाबा कइ हुक्की गुड़गुड़ानि

थोरिक फेरि कहेन –

‘तलिआ बिचारी आ

अवर कुल बुड़न्त किहेन’

हम समझे नाइँ कुछ

टुकुर टुकुर लखत रहे बाबा कँs।

 

अब ई याद परा

मंछा तर आए सब पक्का किहे रहेन

ई पानी पीअइ कइ बाति

कतहुँ केहू से न कहि जाइ

अब तउ बाति खिलि गई

हम जाने, ई हमरइ कसूर आ

सोचे संगहती सब

दोस न हमकाँ देइहीं।

 

बाबा फेरि हुक्की पुड़पुड़ाएन

कहेह – ‘जरि गइ’

उठिके हुक्कौ कँ ठढ़िआइ दिहेन भीति से

चिलमि उलटि के धरेन

अब बैठे पइ बोलेन –

‘तिलकू हमसे कहत रहेन

हम करिया बिकरमा अवर ताली

पानी नाइँ पिए।’

हम कहे – एक ताली

नाय पिएन अवर सब पिएस

अब हम हलुकाइ गए

हमसे जहिरानि नाइँ बाति

तिलकू पहिलेह से

रचे रहेन

ओतना ऊ आड़ बान्ह

एतना ई पूछपेख

हम नाहीं समझे

ई कुलि काहें।

 

पूछि परे, बाबा,

गगरा लोटा माँजिके

हमरे सब पानी पिए

पनिअउ निरमल रहा

फेरि दोस कवन परा

बाबा बोलेन –

तूँ अबहिं समझब्यs न

केतनउ माँजा घँसा

लोटवा गगरवा धोवइ कs रहा, रहे।

 

हम पूछे – एसे का

बर्तन केहू क होइ

पानी पिए दोस कवन।

 

बाबा बोलेन – ‘बाति

लरिक बुद्धि म न आए ई

रनधिरवा कइ छाँह सब बचावथइ

लख्यsहइ दुआरे केहूके ओकाँ

बइठा ठाढ़’

एसे का भ बाबा।

 

बाबा कोपिके बोलेन –

‘ऊ बाम्हनि राखे आ

कइअउ बिटिआ अब ले बेंचि चुका

बेटवन कँ परजाति की

बिटिहनिन से बिअहसेइ।’

 

बाबा कइ कोप लखे

हमहूँ चुपचाप उठे

अवर आनी ओर गए। 

(~कबि तिलोचन सास्तरी) 

15 thoughts on “कबिता : “टिक्कुल बाबा”(कवि: त्रिलोचन शास्त्री)

  • July 26, 2011 at 2:49 pm
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    अमरेन्द्र भाई,
    आपके माध्यम से त्रिलोचन शास्त्री जी कृत ‘टिक्कू बाबा’ पढ़ने को मिली। अवधी भाषा के कवियोँ, लेखकोँ एवं उनकी रचनाओँ से रुबरु कराने का आपका यह कार्य प्रशंसाकारी है। खासकर जब आज के भौतिकतवादी युग मेँ विभिन्न मनोरंजन के साधनोँ के चलते हमारे क्षेत्रीय भाषा साहित्य की पहुँच से आम जनता दूर होती जा रही है, ऐसे मेँ आपका यह योगदान धन्यवाद का भागी है। आभार !

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    • July 26, 2011 at 4:01 pm
      Permalink

      चंदर भैय्या, इन देसज भासन कै रचनासीलता आज की रसहीन हुअत हिन्दी से बहुत ढेर है, कोसिस है रचनन का लाय के ई बात देखाई जाय!

      Reply
  • July 26, 2011 at 2:51 pm
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    बड़का मुक्तक पढाय देहो भाई !नई-नई प्रतिभन ते बढ़िया मुलाकात कराय रहे हौ !यहि तना क कविता पहिली बार झ्याला हवै !

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  • July 26, 2011 at 6:32 pm
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    बड़ी धारदार कविता है त्रिलोचन जी की ! आभार अमरेन्द्र जी !

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  • July 27, 2011 at 2:16 am
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    बाबा त्रिलोचन की कविता खातिर बधाई।टिक्कुल बाबा जस मनई अबहीं गाँवन मा मिलि जाति हैं। अमोला मिलै तो वहिके कुछ बरवै अबकी उनके जनमदिन पर लगावा जाय।

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    • July 27, 2011 at 4:51 am
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      भैया इहै तौ दुख है, अबहीं ले तिलोचन कै अमोला नाहीं मिलि सका है 🙁

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  • July 27, 2011 at 2:24 am
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    ई बहुत नीक प्रयास बा आपके अमरेंदर बाबू… अईसेन पोसत रहा अवधी क… हम तो पहिली दाँव आये हियाँ तौ बहुत नीक लाग… अवधी मा बहुत जबर जबर कबिता हियाँ पढ़े का मिली लागत अहै…

    मुक्तक तौ अपने आप मा एकदम मस्त अहै… त्रिलोचन बाबू और उनकी कबिताई से परिचय करावे के लीये धन्यवाद

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    • July 27, 2011 at 4:52 am
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      भैया, चिप्पी वाले विजेट मा जाइ के अवधी कविता चिप्पी पै जाय के २० अवधी कबितन कै मजा लीन जाय 🙂

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  • July 27, 2011 at 3:11 pm
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    हमरऊ बब्बा अस गुस्सात रहें। अस कहत रहें।
    चला गयें। अब ओसस बात मद्धिम परि गइ बा!

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  • July 28, 2011 at 4:38 am
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    amrender ji bahut dhyaan se kavita padhi. choonki hindi hi jaanti hoon isliye samjh nhi paai. lekin laga koi lota aur beti ki baat hai aur jaati ki bhi… kya yahi hai kripya do line me hindi me kavita ki vyakhya kar den to hamare jaise log bhi iska aanand uthha paayenge. abhaar.

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  • September 6, 2011 at 2:50 am
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    rally guys ths is amazing
    hum logan ka toh apne matra bhasha ke bare main kuch pata nahi raha
    lakin jabse hum amrender ji ka join kia hain fb par kafi acchi knoowledge hoye gai hai awadhi ki
    thanks

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