मुआवजा (कहानी) : डॉ० ज्ञानवती दीक्षित

आजु अवधी साहित्यकार डॉ० ज्ञानवती दीक्षित की कहानी मुआवजा आप सब के तांय प्रस्तुत है. ज्ञानवती जी सहगल कालेज, नैमिषारण्य मां हिन्दी केरी व्याख्याता हैं. १३ अगस्त १९६६ मां जन्मी ई लेखिका हिन्दी औ अवधी दोनौ मां साहित्यरत हैं. इनकेरे लिखे कइयो कहानी संग्रह, उपन्यास, खंड काव्य औ प्रबंध काव्य प्रकाशित हुइ चुके हैं, कुछ अबहीं प्रेस मां हैं. ईके अलावा इनकेर कहानी, कविता, लेख, आलोचना, व समीक्षा आदि समय-समय पर बिभिन्न पत्र-पत्रिकन मां छपत रहत हैं…

मुआवजा

बरसन बाद रामनगर लौटे हन. नौकरी केरी बंदिस देस के अलग-अलग सहरन मां लइ जाति रही. यहि क्रम मां आपन गाँव कहूँ पीछे छूटत गा. अब तौ पता नाय बरसन पहिले देखे चेहरा पहिचाने जइहैं या नांय. जैसेन गाँव जाय वाली पगडंडी पर मुड़ेन– एक अबूझ आवेग तेरे हृदय धड़कै लगा. हमार गाँव– पियारा गाँव– जहाँ केरी माटी हमरी सांसन मां महकत है– जहाँ केरा एक-एक पेड़ हमार पहिचाना है . आय गए हन हमरे पियारे गाँव–
आय गए हन तुमसे मिलै के लिए. हमार आँखी भरि आयीं.

सामने लछिमी काकी केरा घर रहै . अरे यौ एतना टूटि-फूटि गा. कबहूँ यौ गाँव केरा सबसे खूबसूरत घर हुआ करति रहै. हरी-भरी फलिन केरी बेलन से ढका, माटी से लीपा-पोता, चीकन-चमचमात घर. माटी से बने कच्चे घर केतने खूबसूरत हुइ सकत हैं—-यहिका उदाहरन रहै लछिमी काकी केरा घर . बड़ी मेहनती रहै लछिमी काकी. भोरहें से सफाई मां जुटि जातीं. उनकी धौरी गइयौ उतनै साफ़-सुथरी रहती रहै, जेतना गोबर से लीपा उनका आँगन. घर के समुंहे खूब साफ- सुथरा रहत रहै. हम बच्चा लोग हूंआ खेलै जाई, तौ धौरी गइया केर बढ़िया दूधौ पियैक मिलत रहै. कबहूँ काकी मट्ठा बनउतीं, तौ ताजा लाल- लाल मट्ठौ पियैक मिलत रहै. गाँव केरे दूध, दही अउर मट्ठे केरा स्वाद तौ गाँवै वाले जानि सकत हैं. सहरन मां वहिकी कल्पनौ दुस्कर है.

हम धीरे से आवाज दिहेन– काकी- – –

अंदर से कांपत भई आवाज बाहर आई, खांसी के धौंसा के साथ– कउन है?

— हम हन, काकी. अर्जुन- – -.
हमार दिल धड़कि उठा . हमरे सामने मूर्तिमान दरिद्रता खड़ी रहै– फटे-पुरान कपड़ा, चेहरा पर असंख्य झुर्री– मानौ सरीर के हर अंग पर रोग कब्जा कै लिहिन होय . लछिमी काकी केरा अइस हाल होइगा ?
वा पहिले केरी सम्पन्नता कहूँ देखाय नाय परत है. घर केरी खस्ता हालत दूरि से आपन परिचय दै रही रहै.

— अर्जुन हौ ? रामचन्न दद्दा के लरिका ?
बूढ़ी कोटरन मां धंसी आंखी हमार बारीक पर्यवेक्षण कै रही रहैं.

—हाँ ! काकी .
हमरे मुँह से सब्द जैसे कठिनाई से रस्ता बनाय पाय रहे रहै .

—तुम्हार अइसन हाल काकी ? घर मां सब कहाँ गे ? औ सरद कहाँ है ?

— तुम्हरे काका के साथै , सब बिलाय गा, बचुआ.
काकी धम्म से आँगन मां परे पुरान तखत पर बैठि गईं. बरसा मां भीजि के तखत केरी लकड़ी फूलि आई रहै .

—बड़ा फूला-फला रहै यौ आँगन कबहूँ. आजु खाली हुइगा बचुआ. तुम्हरे काका के आंखि मुंदतै सारा जहान बैरी हुइ गवा. सरद का पुलिस पकरि लै गई …. ऊ .. जेल्ह मां है बचुआ .
काकी आँचर से आँखी पोंछइ लगीं .

— जेल मां ??? काहे ?? का किहिस ऊ….?

— कुछ किहिस होत तौ का गम रहै…. बचुआ.. ? निरपराध हमार लरिका जेल्ह मां बंद है . सूबा मां अइसी सरकार है भइया, जौ दलितन की बहू-बिटियन के साथ कुछ होइ जाय ऊँच-नीच, तौ हजारन केरा मुआवजा बाँटत है. गाँव मां हरिजन टोला मां अब रोज केरा तमासा होइ गवा है. हल्ला मचाय के कोई सवर्ण का फंसाय देव. कोई सुनवाई नाय. तुरतै हरिजन एक्ट लागि जात है. सिकायत करइ वाली का मुआवजा दीन्ह जात है. हमार सरद — बेवा केरी अकेल औलाद रहै— उनकी पइसन केरी हवस केर नेवाला बनिगा . हमार सवर्ण होब गुनाह होइगा बचुआ. हमरे साथ खड़ा होवइया कोई नाय रहै. कोई जांच, कोई फ़रियाद नाय सुनी गई. हमार मासूम लरिका, जौ कोई गाँव केरी मेहरुआ की ओर आँखी उठाय के देखतौ नाय रहै—ऊ… जेल्ह मां सरि रहा है — बलात्कार केरे आरोप मां.

लछिमी काकी आँखिन पर आँचर धरि के रोवै लागीं. हम अवाक खड़े रहि गेन. यहु हमार वहै गाँव रहै– जहाँ केरी बहू-बेटी दुसरे गाँव मां ब्याही होतीं तौ बड़े-बुजुर्ग वै गाँव केरा पानी नांय पियत रहैं, कि लडकियैं तौ गाँव भर की सांझी बिटिया भई. वै गाँव मां अइसा घटै लगा पइसन के लिए? तौ का तालाब केरा पानी गंदी राजनीति केरी लाठी से फटिगा …? यहै संविधान रचा गा रहै, हमरे देस केरे लिए ..?

बूढी काकी केरी हिचकियैं हमरे बेजान कदमन केरा पीछा कै रही रहैं. हम धीरे-धीरे चलत भये गाँव केरा गलियारा पार कियेन. सामने हरिजन टोला रहै. धुत सराब पिए भैंरों काका जमीन पर लुढके पड़े रहैं. पास मां काला कुत्ता बइठा पूंछ हिलाय रहा रहै. दुइ किसोरी सिर पर घड़ा लिए पानी लेय जाय रही रहैं. छप्पर के अंदर से कोई मेहरुआ गन्दी-गन्दी गारी दै रही रहै. गारिन के साथ-साथ वहिके घर से मारापीटी की आवाजौ आय रही रहै. ई मारपीट मां छः सात छोटे बच्चा बिलखि-बिलखि के रोय रहे रहैं. पासै बजबजात, कूड़ा से पटी नाली रहै, वहे नाली मां एक सराबी लुढका पड़ा रहै. वहिके ऊपर माछी भिन-भिन करि रहि रहैं. हम राम सुमिरन का बड़ी मुश्किल से पहिचानेन. वौ हमरे साथ पढ़त रहै, अपरिचय के भाव लिए ऊ पास आवा. सिर के बाल खिचड़ी होइगे रहैं. चेहरा पर आश्चर्य के भाव रहैं.

—अरे! बाबू जी, आप ?

— का बाबू जी, बाबू जी कै रहा है….. अरे! हमहन अरजुन- – .हम हंसिके कहेन .

—आव, घरै चलौ.
ऊ सकुचात भवा बढ़ा. चारपाई पर बैठत-बैठत हम देखेन ऊका घर पक्का बनिगा रहै. बाहर हैंडपंपौ लगा रहै.

—और सुनाव का हाल है ?

—हाल देखि तौ रहे हौ, भैया. नाली मां पड़ा है . यहु मुरारी है . भैंरों कक्का केरा लरिका . पीके नाली मां परा है हरामी. गाँव के पंडित टोला के लरिका पर अपनी बिटिया से मुकदमा कराय दिहिस….. बलत्कार कर. मुआवजा मिला है. हैलीकाप्टर से पुलिस के बड़े साहब आये रहैं. दै गे हैं. बस! दारू मुरगा उड़ि रहा है दूनौ बखत…..

—का कहत हौ …? झूठै…?

—अरे भइया!!!!!! पइसे के लिए का-का नाय होत है हियां. महिमां तौ खाली रिपोट लिखवावै की है. एस० ओ० हरिजन है. आधा-आधा पइसा बटिगा ….पब्लिक पुलिस केर पुरान रिलेसन.
राम सुमिरन केरी आवाज दुःख मां डूबी रहै.

—तौ तुम इनका समझावत काहे नांय ? तुम तौ पढ़े-लिखे हौ…

—हमरे कहै से कोई काहे सुनै और मानै ..? हम मेहनत करइक कहित है… जब हराम केरा मिलि रहा है, तौ मेहनत को करी. एक-एक मेहरुआ केरे आठ- आठ , नौ-नौ लरिका हैं, एतनी योजना चलि रही हैं, आबादी बढाए जाव बस!
हम गाँव से निकरेन तौ मन बहुत दुखी रहै. का होइगा है हमरे प्यारे गाँव का…? पहिले कइस भाईचारा रहै …? अदब , लिहाज, शर्मोहया सब नष्ट होइगा. घर पंहुचेन तौ लड़िका-बच्चा घेरि लिहिन.—

—पापा! पापा! गाँव से हमरे लिए का लाएव?
का बताइत, का लइके आयेहन. मन बहुत दुखी रहै. सोचेन टी० वी० देखी. टी० वी० खोलेन तौ आगी केरी लपटन मां धधकत एक घर देखाई पड़ा. कुछ गुंडा कूदि-कूदि के आगी लगाय रहे रहै. नेपथ्य से उदघोषक केरी आवाज आय रही रहै—– “जी हाँ! यह वही घर है…. जहाँ पं० जवाहर लाल नेहरू रहा करते थे……. जब वे पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे. आज वर्त्तमान अध्यक्ष के बयान से क्रुद्ध होकर सत्ताधारी दल के समर्थकों ने इसे फूँक दिया है. अध्यक्ष को हरिजन एक्ट के तहत गिरफ्तार कर जेल में ठूंस दिया गया है. विरोध प्रदर्शन जारी है….”

हम टी० वी० बंद कै दियेन. सामाजिक परिवर्तन, न्याय, और समानता केरे नाम पर नई-नई पार्टी खड़ी भई हैं. हम सोचि रहे रहन इनका लोकतंत्र केरे कौने अध्याय मां पढ़ावा जाई ..??

डॉ० ज्ञानवती दीक्षित
सीतापुर

4 thoughts on “मुआवजा (कहानी) : डॉ० ज्ञानवती दीक्षित

  • April 8, 2011 at 10:09 am
    Permalink

    आपका सुक्रिया !
    कहानी दुबारा देखि लिहेन। बढ़ियाँ है।
    भ्रष्टाचार और अराजकता केर नित नई राहैं नकरि रही हैं, हाँ यहू तौ यक स्वर हयिन है, जेहिका रखै कै कोसिस ग्यानवती जी किहिन हैं, यहिते कहानी नई – मुला जौन बराय दीन गै हुवै – चीज का रखै वाली हुइ गयी है।

    सादर..!

    Reply
  • April 10, 2011 at 3:19 pm
    Permalink

    @ कहानी/कहानीकार..
    — मैने पहले कहा है ’यहू तौ यक स्वर हयिन है, जेहिका रखै कै कोसिस ग्यानवती जी किहिन हैं, यहिते कहानी नई – मुला जौन बराय दीन गै हुवै – चीज का रखै वाली हुइ गयी है। ’ , कहानी में व्यक्त यथार्थ संबंधी जानकारी करने के उपरांत अब उसके आगे बात बढ़ाना चाहूँगा।

    निश्चित रूप से यह एक स्वर है, एक यथार्थ , कहानी में लाया जा सकता है, पर साहित्यिक रूप ( लिटरेरी फोर्म ) में इस यथार्थ का बर्ताव ( ट्रीटमेंट ) बहुत सधे हाथों से होना चाहिये था, इस दृष्टि से यह कहानी सफ़ल नहीं कही जायेगी।

    प्रेमचन्द ने कफन ( कहानी ) लिखी और दलितों की चेतना-दशा को दिखाया, जिसकी आलोचना आज भी कतिपय दलित साहित्यकार करते हैं, पर प्रेमचन्द द्वारा ट्रीटमेंट उस यथार्थ की जटिल-स्तरीयता को व्यक्त करने में सक्षम रहा, इसलिये कहानी निर्वाह की दृष्टि से सफ़ल रही।

    ऐसी घटनाओं की संख्या अत्यल्प है, जैसा कहानी में कहा गया है। दूसरी बात अपनी बेटी के बलात्कार की अफ़वाह उड़वा कर कोई भी भारतीय मानस ( जिसमें दलित भी आता है ) यों ही नहीं तैय्यार हो जायेगा। ऐसी अत्यल्प घटनाएँ पूरी जटिलता से रखी जानी चाहिये, नहीं तो कहानी अनिवार्यतः एकतर्फिया दोष से युक्त होगी। कहानी में दलित बस्ती का जुगुप्सु वर्णन है, हो सकता है पर वर्णन क्रम में साहित्यकार का इतना औदात्य बखूबी रहे कि वहाँ भी शुभ्र है, शुचि है, ग्राह्य है, ऐसा न हो गोकि यही प्रतिनिधि स्वर है।

    हरिजन एक्ट के परिणाम अपनी प्रक्रिया और परिणति में निर्भ्रांत/असंदिग्ध रहे हैं, ऐसा जबरिया मानने का मेरा कोई हठ नहीं है परंतु इससे तथाकथित नीची जाति में एक सुकून की स्थिति बनी है यह भी एक सच है। ऐसी स्थिति में ऐसे एक्ट के नकारात्मक प्रयोग न हों , यह और भी आवश्यक है, इस दृष्टि से साहित्यकार जगे यह जरूरी भी है, पर साहित्यिक – सधाव बेहतर होना चाहिये।

    कहानी लोक-भाषा में है, इससे प्राथमिक खुशी मुझे भी है, पर इतनी बातें कहना आवश्यक लगा। उम्मीद करता हूँ कि ये बातें सकारात्मक तौर पर ली जायेंगी।

    सादर;
    अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी

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