कविता : राम-राम हरे-हरे ( बोधिसत्त्व )

कवि बोधिसत्व

आज कवि बोधिसत्व कै कबिता आपके सामने रखत अहन। कविता है : “राम-राम हरे-हरे” ! यहि कबिता का अभय जी के बलाग से सादर लियत अही। अभय जी यहिकै अनुमति दिहिन, बोधि जी का मैसेज भेजेन तौ कौनउ जबाब नाय दिहिन। थोरा सुस्त परेन, मुला अभय जी भरोसा बढ़ाइन तौ नीक लाग। बोधि जी हिन्दी मा कबि के तौर पै फेमस हैं, वनकी यहि रचना मा हमैं अवधी कै भरपूर छ्टा देखान। कविता मा मिथकन के जरिये अपने समय-समाज कै बाति कही गै है। कबिता हाजिर है :

घरे-घरे दौपदी, दुस्सासन घरे-घरे।
हरे राम हरे राम, राम-राम हरे-हरे॥

गली-गली कुरुक्षेत्र, मरघट दरे-दरे।
हरे राम हरे राम, राम-राम हरे-हरे॥

देस भा अंधेर नगर, राजा चौपट का करे।

हरे राम हरे राम, राम-राम हरे-हरे॥

सीता भई लंकेस्वरी, राम रोवें अरे-अरे।
हरे राम हरे राम, राम-राम हरे-हरे॥

राजा दसरथ भुईं लोटैं, राज करे मंथरे।

हरे राम हरे राम, राम-राम हरे-हरे॥

आम गा महुवा गा, अब त बस बैर फरे। 

हरे राम हरे राम, राम-राम हरे-हरे॥

कोयल मोर मूक भए, दादुर टर-टर टरे।

हरे राम हरे राम, राम-राम हरे-हरे॥

ऊपर से कुछ बात, और कुछ बा तरे-तरे।

हरे राम हरे राम, राम-राम हरे-हरे॥

                                           ( बोधिसत्त्व )
नोट : इस रचना का भाव हस्तामलक ( हाथ पर रखे आँवले की तरह स्पष्ट है ) है, इसलिये इसका ‘हिन्दी में भावार्थ’ करने से जी चुरा रहा हूँ J  


सादर;
अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी

27 thoughts on “कविता : राम-राम हरे-हरे ( बोधिसत्त्व )

  • February 26, 2011 at 1:28 pm
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    ऊपर से कुछ बात, और कुछ बा तरे-तरे…….वाह सामाजिक जीवन चरित्र और इंसानी फितरतों का …दशरत से …द्रोपदी तक का गज़ब का वश्लेषण किया है …उसी तरह से राजनेतिक परिद्रस्य का भी साथ साथ ..बहुत सुन्दर विश्लेषण …सही में कवी का जीवन चरित्रार्थ किया है जो समाज में उथान या जगाने का सन्देश देसके वाही असल में कवी …बहुत ही सुन्दर बोधिसत्त्व जी का इस तरह का वेश्लेषण पड़ने का कविता के रूप में ….शुक्रिया सर जी !Nirmal Paneri

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  • February 26, 2011 at 4:22 pm
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    .
    @ दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi

    कॄपया उद्धरण के तौर पर इन्हें देखें :

    ”हमारे अहिंदी भाषी भाई समझते हैं कि उत्तर में एक ही हिंदी भाषा है, बाकी उसी की छोटी-छोटी बोलियां हैं। पर मैथिली, अवधी, ब्रजी और मारवाड़ी को कौन बोली कह सकता है, जिनका काव्य साहित्य हमारी हिंदी से कहीं अधिक पुराना और गुण तथा परिमाण में अधिक नहीं तो कम समृद्ध नहीं है। वस्तुतः वह बोलियां नहीं, साहित्यिक भाषाएं हैं।” [ ~ राहुल सांकृत्यायन ]

    और

    ”किसी भाषा को केवल इसीलिए बोली नहीं कहा जा सकता कि उसका साहित्य लिपिबद्ध नहीं हुआ।” [ ~ राहुल सांकृत्यायन ]

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  • February 26, 2011 at 5:06 pm
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    राहुल जी की बात जिस संदर्भ में कही गई है वे बिलकुल सही हैं। यहाँ संदर्भ कुछ और था। आप ने कहा इस कविता का भाव स्पष्ट है। मैं ने कहना चाहा कोई भी हिन्दी भाषी इस रचना को हिन्दी की मानेगा, क्यों कि यदि वह केवल हिन्दी ही जानता है तो भी इस कविता को संपूर्ण रूप से समझ लेगा। केवल खड़ी बोली हिन्दी नहीं है। वह अपने पूरे कुनबे के साथ हिन्दी है। यदि हम इस तरह सोचें तो तुलसीदास अवधी के सूरदास बृज के सूर्यमल्ल हाड़ौती/राजस्थानी के हो कर रह जाएंगे।

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  • February 26, 2011 at 5:17 pm
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    राहुल जी की पहली उक्ति …
    ”हमारे अहिंदी भाषी भाई समझते हैं कि उत्तर में एक ही हिंदी भाषा है, बाकी उसी की छोटी-छोटी बोलियां हैं। पर मैथिली, अवधी, ब्रजी और मारवाड़ी को कौन बोली कह सकता है, जिनका काव्य साहित्य हमारी हिंदी से कहीं अधिक पुराना और गुण तथा परिमाण में अधिक नहीं तो कम समृद्ध नहीं है। वस्तुतः वह बोलियां नहीं, साहित्यिक भाषाएं हैं।” [ ~ राहुल सांकृत्यायन ]
    का संदर्भ देखें, वे कह रहे हैं कि हमारे हिन्दी भाई समझते हैं कि ….
    यह समझ हिन्दीभाषियों की नहीं है। यहाँ राहुल जी इन आंचलिक बोलियाँ/भाषाएं बोलने वाले लोगों को कह रहे हैं कि उन्हें इन बोलियों को भाषा समझना चाहिए और उस में सृजन की परंपरा को चालू रखना चाहिए।
    यह तो हम भी करते हैं। मेरी अपनी बोली 'हाड़ौती' को हम भाषा ही समझते हैं। इन बोलियों में अभिव्यक्ति की जबर्दस्त क्षमता है। अनेक शब्द ऐसे भावों को अभिव्यक्त करते हैं जिन की अभिव्यक्ति अन्य किसी भी शब्द से संभव नहीं हो सकती।
    मेरा मानना है कि हिन्दी मात्र एक भाषा नहीं अपितु अनेक भाषाओं/बोलियों का समूह है, एक वृहत् परिवार है। हिन्दी और इन भाषाओं/बोलियों में कोई झगड़ा नहीं है।

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  • February 26, 2011 at 5:41 pm
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    .
    @ दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi

    इस रचना की बात करें तो इसमें अवधी का व्याकरण है , क्रिया रूप है .
    इस वजह से इसे आंचलिक हिन्दी नहीं , बल्कि अवधी ही कहना पसंद करूंगा . हिन्दी का आंचलिक रूप या बोली कहकर भाषाओं की स्वतंत्र सत्ता बाधित की गयी है , स्वतंत्र भारत में तो और भी !
    तुलसी पहले अवधी के , सूर पहले ब्रज के ….आदि है , ठीक वैसे ही जैसे नामदेव पहले मराठी के , नरसीदास पहले गुजराती के ! पर पहले भारत में भाषाओं में परस्पर संवाद की संस्कृति रही , जिसका बड़ा प्रमाण 'मानस' है ! कबीर भोजपुरी के होकर भी गुरुग्रंथ साहिब में हैं ! ऐसे कई अन्य उदाहरण भी हैं !
    पर जब से 'हिन्दी' का नव्य भारतीय अस्तित्व आया , ये भाषाएँ हिन्दी की बोलियाँ कहकर ( आंचलिकताएँ कहकर ) दबा दी गयीं ! इस दृष्टि से हिन्दी १०० साल की है जिसकी ओर सही संकेत शिवदान सिंह चौहान ने अपनी पुस्तक ''हिन्दी साहित्य के अस्सी वर्ष'' में किया है !

    @ हिन्दी और इन भाषाओं/बोलियों में कोई झगड़ा नहीं है।
    — प्रश्न झगडे का नहीं है , पर एक नजर साहित्य अकादमी-भारत की भाषा नीति पर डालिए , हिन्दी के अंतर्गत रखकर बलात उपेक्षित इन भाषाओं की स्थिति और मांगों का सहज अंदाजा लग जाएगा |

    आपकी अन्य बातों से पूर्ण सहमत हूँ .

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  • February 26, 2011 at 6:30 pm
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    बहुत नीक लगा पढ़ी कय….
    हरे राम हरे राम, राम-राम हरे-हरे॥

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  • February 26, 2011 at 7:14 pm
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    बढ़िया व्यंग रचना बोधसत्व जी की !
    धन्यवाद त्रिपाठी जी !

    Reply
  • February 27, 2011 at 9:32 am
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    ऊपर से कुछ बात, और कुछ बा तरे-तरे।
    ई त सचमुचे जोरदार बा हो !

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  • February 27, 2011 at 10:46 am
    Permalink

    चलिए एक दोहा मैं भी जोड़ने का प्रयास करता हूँ…

    उड़ि गये सुगना मास्टर भी का करे
    हरे राम हरे राम राम राम हरे।

    एक और बन रहा है….

    गदहा त गदहा धोबिया भी घास चरे
    हरे राम हरे राम राम राम हरे।

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  • February 27, 2011 at 3:23 pm
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    लगा कि किसी बड़े-बुजुर्ग की आहिस्‍ते-आहिस्‍ते कही जा रही बात सुन रहा हूं.

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  • February 27, 2011 at 4:08 pm
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    बोधि भाई ने अवधी में बहुत सारे गीत लिखे हैं…आप थोड़ा कोशिश कीजिये…सब मिलेगा। मैसेज कैसे देखते 3 दिन से कविता समय में व्यस्त थे न भाई!

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  • February 27, 2011 at 4:11 pm
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    देवेन्द्र जी के दूसरे दोहे पर मेरी गहरी आपत्ति है…वैसे इस कविता के कुछ दोहों पर भाई से सीधी आपत्ति भी दर्ज़ करा चुका हूं।

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  • February 28, 2011 at 8:08 am
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    baba ji aapki lekhni ke kuch sabdon par asahmati hai, lekin is mudde ko uthane ke liye aapka aabhari hu.

    Reply
  • February 28, 2011 at 8:44 am
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    अवधी आंचलिक हिंदी नहीं बल्कि हिंदी का आंचल है…..दिनेश भाई….अशोक मेरी एक छोटी कविता

    वह दिन

    वह दिन
    कभी न आए
    जब सब सबसे सहमत हो जाएँ
    वह दिन घर के सामने से निकल जाए
    सचमुच
    कभी न आए
    वह दिन आग में जल जाए
    समुद्र में डूब जाए
    किंतु कभी हमारे पास न आए
    जब सब सबको अच्छा लगे
    और सब सबको देख कर मुसकायें
    सब सबके गले मिल जाएँ
    वह दिन कभी न आए।
    अमरेन्द्र जी आपका आभारी हूँ….आपको कोई संदेश अब तक नहीं मिला है…उत्तर क्यों न देता…

    Reply
  • February 28, 2011 at 9:14 am
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    @ अशोक जी , मैसेज तो १० दिन पूर्व ही फेसबुक से भेजा था , पर जैसा पता चला की वह पहुंचा ही नहीं …अन्य रचनाओं की टोह में हूँ .. मागूंगा हुजूर से .. ये रचनाएँ आनी चाहिए ..

    Reply
  • February 28, 2011 at 9:15 am
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    @ प्रभात जी , शुक्रिया …और असहमतियों को निस्संकोच हो कर कहिये , मुझे अपने को सुधारने का मौक़ा भी तो मिलता है इससे ..

    Reply
  • February 28, 2011 at 9:16 am
    Permalink

    @ बोधि जी , शुक्रिया पधारने के लिए .. आपकी एक और सुन्दर कविता पढ़कर आनंद आया ..
    और
    मैसेज नहीं पहुंचा होगा फिर ..फेसबुक से ही भेजा था , दुबारा नहीं भेजा क्योंकि कोई 'रिपोर्ट तो स्पैम' कर देता है तो फेसबुक वाले एकाउंट लोस की धमकी पर आ जाते हैं !

    Reply
  • February 28, 2011 at 12:34 pm
    Permalink

    priy amarendra ji, kavita itani pyari lagee ki ise mai apni patrika ''saddbhavana darpan'' ke aagamee ank me le raha hoo. iss blog se saabhar..

    Reply
  • February 28, 2011 at 4:12 pm
    Permalink

    .
    @ girish pankaj

    पधारने और कविता को सराह्ने के लिये धन्यवाद !
    और
    कवि बोधिसत्त्व जी की यह कविता मैने अभय तिवारी जी के ब्लोग से साभार लिया है , तो बेहतर होगा कि ब्लाग के तौर पर आप वहीं का साभार ग्यापित करें ! उन्के ब्लोग का लिन्क यह रहा :

    http://nirmal-anand.blogspot.com/2010/12/blog-post_20.html

    सादर..

    Reply
  • February 28, 2011 at 6:22 pm
    Permalink

    हम तो सप्ताह भर पहले ही बोधि जी के ब्लॉग पर पहुंचे थे और पछता चुके कि अब तक कैसे नहीं पहुंच सके?
    ये कविता भी महा आनंददायी लगी।
    अमरेन्द्र, इस बार निमित्त आप बने हैं। धन्यवाद लें आप सभी, बोधि जी, अभय जी और आप।

    Reply
  • February 28, 2011 at 9:15 pm
    Permalink

    भाई गिरीश जी
    प्रकाशित होने पर मेरे पास भी भेजिएगा
    अमरेन्द्र जी आपका फिर से आभार..

    Reply
  • March 1, 2011 at 8:22 am
    Permalink

    बहुत सुन्दर रचना… जो आज भी सामयिक है और आगे भी रहेगी…
    बोधिसत्व जी को शुभकामनाएं…

    अमरेन्द्र को आभार!

    Reply
  • March 2, 2011 at 6:25 am
    Permalink

    त्रिपाठी भइया ई ब्लाग तो बहुतै बढ़िया है..
    सब रचना बेजोड़ हैं..
    खास कर ई कविता तो बिल्लकुलै कटाक्ष है अपने समाज पर..
    आज अयोध्या वासियन मा भी बदलाव आवै लाग है ..पता नाहीं काहें इस नगरिया के प्रति आदर भाव घटै लाग है..
    आप कै ई ब्लाग अवधि के साथै अगर अवध नगरी कै भी प्रचार प्रसार करें तो फिर से अयोध्या का पुरान गौरव वापस लौट सकत है.. अबहिं तो खाली बाबरी मस्जिद और राम मंदिर विवाद ही अयोध्या का पहचान देखाय परत हैं..

    ashish mishra
    dholkipole.blogspot.com

    Reply
  • March 2, 2011 at 10:10 am
    Permalink

    @ आशीष मिश्र
    आपकै अवाई अउर हौसिला अफ़्जाई नीक लाग। हमार कोसिस इहै रहे कि अवध/अवधी की पूरी पहिचान कै झाँकी लोगन के सामने रखि सकी , यकंगी नाय। बहुत बहुत सुक्रिया !

    Reply
  • March 7, 2011 at 6:06 am
    Permalink

    बहुत ही सुन्दर और रोचक लगी | आपकी हर पोस्ट
    आप मेरे ब्लॉग पे भी आये |
    मैं अपने ब्लॉग का लिंक दे रहा हु
    http://vangaydinesh.blogspot.com/

    Reply

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