खिचरी के तिउहार पै सबका सुभकामना ……. ” उत्सव प्रियाः खलु मनुष्याः” ……..

पढ़ैयन का राम राम !!!
………………. खिचरी के तिउहार  पै सबका सुभकामना ……………………
‘ अवधी कै अरघान ‘ की महफ़िल मा आप सबकै स्वागत अहै ..
…………………………………………………………………………………………………………………………..
[आज खिचरी कै दिन आय अउर घर से दूर रहै वालेन का यहि दिन पै घर कै याद बहुत सतावत 
है ..घरे फोन किहेन तौ पता चला खिचरी चार बजे के बाद लागे .. फिर खिचरी पै पोस्ट बनावै मा   
लागि गयन .. कुछू नाहीं तौ इहै सही …]

‘ उत्सव प्रियाः खलु मनुष्याः” …… 
                    ई गजब कै संजोग है कि कमोबेस यही समय पूरे भारत मा तिउहार मनावा जात है .. 
हाँ अलग -अलग नाम भले हुवैं तिउहार कै , मसलन तकरीबन यही समय ( यकाध दिन आगे

पीछे) जम्मू, हरियाणा, पंजाब मा ‘लोहड़ी’ मनाई जात है , गुजरात औ महाराष्ट्र मा यहिका ‘हडगा ‘ 

के रूप मा मनावत हैं, असम कै उल्लास ‘बिहू’ के रूप मा सामने आवत है , बंगाल कै ‘गंगासागर 

कै मेला’ तौ बेजोड़ होबै करत है , तमिलनाडु मा ‘पोंगल’ अउर आन्ध्र मा ‘उगादी’ के मनावै कै 

जोरसोर से चलन अहै,छत्तीसगढ़ मा यहिका ‘खिचड़ी अउर तिलगुझिया के तिहार’ के तौर पै मनावत हैं सब, 

उत्तर प्रदेस बिहार, मध्य प्रदेस आदि जगहन ‘खिचडी’ ही मुख्य रूप से कहा जात है ई तिउहार, 

उत्तराँचल मा ‘घुघुतिया या कालाकौवा’ कै चलन अहै, बुंदेलखंड मा ‘सुकरात’ कहत हैं … यहितरह 

भारत के विभिन्न भागन मा ई परब मनावा जात है ..

     अरे भैया लमसम यही समय पूरे दुनिया भर मा उत्सव कै लहर देखी जाय सकत है .. यक 

निगाह डारे पै पता चलत है कि अमरीका मा ‘ थैंक्स गिविंग ‘ कै ‘फेस्टिवल’ कुछै दिन पहिले रहा.

थाईलैंड कै ‘सोंगक्रान’, लाओस कै ‘पीमलाओ’ अउर म्यामार कै ‘थिन्ग्यांग’ यहि उत्सव – लहरिया 

कै गवाही दियत हैं ..

    उत्सव कै जवन लहर सूरज भेजत है वहिमा दुनिया भर कै मनाई नहात है … कालीदास सहियै

लिखिन हैं कि मनाई उछाह कै प्रेमी हुवत है … ” उत्सव प्रियाः खलु मनुष्याः ” | 

मकर-संक्रांति’ यानी सूरज केन्द्रित है ई तिउहार …….

                          मुख्य रूप से ई परब आय सूरज के उपासना कै .. जहाँ जहाँ ई परब मनावा जात 
है हुवां सूरज के भूमिका का ध्यान मा रखा गा है . कहीं – कही सीधे वहिकै पूजा कै विधान है तौ कहूँ 
कहूँ  फसल – पूजा के माध्यम से .. अमरीका के ‘थैंक्स गिविंग’ कै सम्बन्ध फसल से है .. तमिलनाडु
कै ‘पोंगल’ फसल के तिउहार के रूप मा मनावा जात है .. सूरज अउर फसल यक दुसरे से केतना जुड़ा
अहैं , यहिका अलग से बतावै कै कौनौ जरूरत नाय न … 
                         यहि दिन भगवान भुवन भासकर उत्तर कै रुख करत हैं . यही दिन सूरज धनु रासि का 
छोड़ के मकर रासि पै धावत है .. यहि तरीके से ई संधि बेला आय यानी ‘संक्रांति’ .. मकर रासि पै आवत 
है सूरज यहिसे ‘मकर संक्रांति’ कहा जात है .. गोसाईं तुलसीदास जी कहे अहैं —
                                                  ” माघ मकरगत रवि जब होई  |
                                                    तीरथ पतिहिं आव सब कोई | | ” 
आज से उत्तरायन सुरू हुवत है .. यक बहुत पवित्तर समय .. यहिके इंतिजार मा महाभारत कै भीसम 
पितामह आपन प्रान देही मा रोके रहिगे , जब उत्तरायन भा तौ वै प्रान छोड़िन .. ई माना जात है कि उत्तरायन
हर प्रकार से मंगलकारी हुवत है ..उपनयन , नामकरन , अन्नप्रासन , गिरिह-प्रबेस , बियाह जैसे संस्कार 
यहि अवधी मा सम्पन्न हुवत हैं .. 

 अवध मा खिचरी  …….
                         अवध मा यहि तिउहार का ‘खिचरी’ कहा जात है .. जाड़ा भै यही कहा जात है — ” खिचरिया 
भै सूरुज भगवान अईसै खिसियाय – खिसियाय निकरिहैं , काम धाम खिचरी तक धीमै रहे , भैया ! ” औ सही 
बतायित अहन कि जैसे खिचरी कै दिन आवत है , यक नयी स्फूर्ति दौड़ जात है सबके अन्दर .. सबही नदी मा 
तरय पहुंचय लागत है ! … कुछ घरहीं जुटत हैं ” मन चंगा तौ कठौती मा गंगा ” .. सबही नहाय – धोय के फर्च
होइके खिचरी छुवत है .. यहिमा चावल , दाल , तिल , नोन आदि चीजैं रहत हैं , पहिले यहिका छुई के फिर लोगईआहार करत हैं .. अन्नदान बहुत सुभ माना जात है ,यहि दिन .. देसी घिउ के साथ खिचरी कै सुवाद केहू लिखि नाय सकत ..  
                  खिचरी  पै नदी पै नाहब खास आकर्सन कै केंद्र रहत है .. गंगा अउर सरजू मा लोग ‘जयकारा
( गंगा या सरजू माई की जै कहिके ) बोल के डुबुक्की लगावत हैं .. जाड़ा छू मंतर होइ जात है .. सूरज कै पूजा 
कीन जात है .. माघ भै कलपबास करत हैं लोगै .. फैजाबाद मा गुप्तारघाट पै पहिले बहुत हुवत रहा पर अब ई सब समय बीते के साथ पुरान मानि लीन गा .. 
                          प्रयाग के जिक्र के बिना बात बहुत अधूरी रहे .. तुलसीदास जी लिखे अहैं ”तीरथ पतिहिं आव सब कोई ” .. भैया आवै वाले ‘सब कोई ‘ मा सिरिफ इंसानै नाय है बल्कि  भगवानौ अहैं .. ई माना जात है कि खिचरी पै हियाँ सारे देउता भेस बदल के प्रयाग पै नहाय आवत हैं .. नह्वैयन कै बड़ी भीड़ रहत है प्रयाग , इलाहबाद मा , वाहू मां कुम्भ औ महाकुम्भ ! पूछौ न ! जगह थोरि परि जात है .. नहाये के बाद बगलै ‘अक्षय वट’ कै दरसन कीन जात है .. मान्यता है कि ई पेड़ कौनिव परलय मा समाप्त नाय हुवत .. हियाँ कै कलपबास तौ जगजाहिर अहै .. बहुत पहिले रिसी मुनि सब आवत रहे यहि खातिर , बकौल तुलसीदास —
                                          ” यहि  प्रकार  भरि  माघ  नहाहीं |
                                          पुनि सब निज-निज आश्रम जाहीं || ” 
                          यहि तरह अवध मा खिचरी बड़ी धूम धाम से मनाई जात है .. 

सोचौ ! रामौ उड़ावत रहे पतंग …
                         भैया ! पतंगबाजी कौनौ नवा खेल न आय .. पतंग नयी ह्वै सकत है पै खेल नाहीं .. त्रेता कै 
रामौ पतंग उड़ावत रहे ! खिचरी के दिन पतंग उडवाई कै बिधान आज तक चलत अहै .. राम कै कीन काम 
के छोडी ! .. राम जी अपने भायन अउर हनुमान के साथ अस करत रहे .. तुलसीदास जी के हवाले से यहौ
बताउब ठीक होये .. 
                       राम जी यक दिन पतंग उड़ायिन अउर ऊ इन्द्रलोक तक पहुँच गै — ” ‘राम इक दिन चंग उड़ाई|
 इंद्रलोक में पहुँची जाई || ” हुवां सब सोचै लागे — ”जासु चंग अस सुन्दरताई। सो पुरुष जग में अधिकाई।।”
इन्द्र  लोक मा सब सोचिन कि जिह्कई पतंग आय ऊ लियै तौ औबई करे .. इंतिजार के बाद जब पतंग नाय आवा तौ राम हनुमान का पतंग लावे के बरे भेजिन .. भगवान के दरसन कै आश्वासन पाये  के  बाद इन्द्र-पुत्र जयंत कै मेहरारू पतंग लौटायीं .. ” तिन तब सुनत तुरंत ही, दीन्ही छोड़ पतंग। खेंच लइ प्रभु बेग ही, खेलत 
बालक संग।।” .. यहि तरह पतंग आयी ..
……………………………………………………………………………………………………………………………………………..

अंत मा फिर आप सबका खिचरी कै बहुत बहुत सुभकामना …
अगिले अत्तवार का मिलब ..
तब तक … राम राम !!!                          

21 thoughts on “खिचरी के तिउहार पै सबका सुभकामना ……. ” उत्सव प्रियाः खलु मनुष्याः” ……..

  • January 14, 2010 at 1:56 pm
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    थोड़ी मशक्कत करनी पड़ी पढने में ..पर जानकारी अच्छी लगी.

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  • January 14, 2010 at 2:28 pm
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    सुन्दर ललित निबन्ध।
    दी गई जानकारियाँ उपयोगी हैं।
    ये आलेख अवधी को समृद्ध कर रहे हैं। आज यहाँ पहली बार टिप्पणी करने में सफल हो रहा हूँ।

    Reply
  • January 14, 2010 at 2:30 pm
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    खिचरी तिउहार के सुग्घर जनकारी।
    गगां तट पे नहावे नर अउ नारी॥

    खिचरी खाए के बने बल बुधि विशारद।
    समय साथे चलिए जाए नहि अकारथ॥

    बने रहे जग का यह सुवारथ।
    जब लग होये करिए परमारथ॥

    Reply
  • January 14, 2010 at 5:08 pm
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    बहुतै नीमन नीमन जानकारी आप दी देहेन-आपु क यहीं अवसर पर बहुत बहुत शुभकामना

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  • January 15, 2010 at 6:18 am
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    आपको मकर संक्रान्ति की बहुत-बहुत बधाई ।

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  • January 15, 2010 at 9:07 am
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    खिचरी तिउहार के बहुत-बहुत शुभकामनायें

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  • January 15, 2010 at 9:39 am
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    —————-विलम्ब के लिए क्षमा ,बहुत अच्छा लिखा है आपने.—–

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  • January 16, 2010 at 7:08 am
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    अमरेन्द्र जी
    आप को भी मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनायें
    जानकारियों में लिपटी सुन्दर रचना
    बहुत बहुत आभार

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  • January 18, 2010 at 2:12 am
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    इस पर्व पर इतना सुंदर आलेख पहली बार पढ़ने को मिला.
    अवधिया भाषा के अपनत्व ने इस पर चार-चाँद लगा दिया.
    चंग उड़ाने का तुलसीदास जी का वर्णन … खूबसूरत बन पड़ा है.
    …बधाई.

    Reply
  • January 18, 2010 at 5:02 pm
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    वाह आपने खिचरी का नाम लेकर बचपन के बहुत सारे दिनो की याद दिला दी .हमरे यहाँ भी खिचरी ही बनती थी आज के दिन ।

    Reply
  • January 20, 2010 at 2:06 am
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    अमरेन्द्र भाई ! त्यौहार से जुड़ा अर्थ-शास्त्र समझा गये हैं हेनरी ! खयाल रखा करें !

    प्रयाग में त जुटान होइबै करी भईया ! शुभकामना त फोनवै पर दे दिहल रहै ! आभार !

    गिरिजेश भइया क दिक्कत सुना भाइ ! टिप्पणी करै मां परसान हो जालैं ! दिक्कत कहाँ बाय, समझ ला !

    आ रहल इ रम्य-निबंध, त भइया का कहीं ! कहले ना कहाला इ लोक रंग में रँगल तोहार लेखनी क चमत्कार !

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  • January 23, 2010 at 5:47 am
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    अमरेन्द्र जी
    खिचड़ी की देर से ही सही मगर शुभकामनायें…….अवध और पूर्वांचल के इस त्यौहार का बहुत ही बढ़िया वर्णन अपने किया है……अवधी में यह पोस्ट अलग रंग बिखेर रही है….तस्वीर तो बेहतरीन …….लगे रहो अमरेन्द्र भाई!

    Reply
  • January 25, 2010 at 7:14 pm
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    अमरेन्द्र ….मेरे प्यारे छोटे भाई…तुम्हारे टैलेंट के आगे मैं नतमस्तक हूँ…. बहुत अच्छी लगी यह पोस्ट….

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  • January 26, 2010 at 1:54 am
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    इस खिचड़ी (भाषाई ) पर नजर जरा देर से गयी …
    बिहार में भी तो इसे खिचड़ी ही कहा जाता रहा है और इस दिन विशेष मटर पुलाव या खिचड़ी जैसा व्यंजन भी बनाया जाता है …खील और चिडवे के लड्डू भी याद आ गए इस पर्व के नाम से …
    गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें …!!

    Reply
  • January 26, 2010 at 4:13 pm
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    ई नगद लाग कि हैनरी जी भी खिचरी खाना पसन्द करते हैं। 🙂
    दुनिया खिचड़ी को अपना मुख्य खाद्य बनाले तो स्वर्ग उतर आये धरा पर।
    कम से कम जब मुझसे घर में पूछा जाता है कि का बने, तो मैं ज्यादातर कहता हूं खिचड़ी।
    पण्डित, देर से पढ़ा पर बहुत आनन्द आवा पढ़े में।

    सूर्ज देव रिसान हयें अब्बो तक! संक्रान्ति के बहुत बाद भी! 🙂

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  • January 15, 2011 at 4:14 pm
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    भाई अमरेन्द्र,
    खिचरिन केर बहुतै बधाई , बहुतै बढ़िया जानकारी दीन्हेउ | समूचा बिस्व खिचरिन केर गुन गान करति है; ई केर महिमा अपरम्पार है, अकेल मनई केर खास तौर से जिनका खाना बनावेक नाए आवत है उनकेर तो सबतें बड़ा सहारा है|
    -साभार
    -नाम देव पाण्डेय
    ndp1966@gmail.com

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  • January 16, 2012 at 12:14 am
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    गजब संजोग हे कि हम ई निबन्ध आजु खिचड़ी के दिने पढ़लीं। भलहीं एक साल बाद। खूबे आनंद मिलल। अमरेन्दर बाबु, तोहरे लेखनी में सुरसती बिराजें। ऐसहीं जमवले रहऽ। जियरा जुड़ा ग‍इल।

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