पाहीमाफी [१०] : सधुवाइन कै परबचन

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  दुसरका भाग  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग७-वाँ भाग८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १०-वाँ भाग :

jagrath

धरम संस्था कय चीर-फाड़ पाहीमाफी मा हुअत जाति अहय। रचनाकार का बहुत नगीचे से धरम कय भरम समझय कय मौका मिला। वहिका परतख परमान मिला, जैसे कि भाग नौ मा, और वहिका अइसेव लोग मिले जे धरम-भरम का बेपर्द कय दिययँ। जैसे यहि अंक कय सधुवाइन। यइ अहीं तौ सधुवाइन लेकिन बड़ा नजदीकी तजुरबा बतावति अहयँ। समाज मा औरतन के ताईं सब धरमन कय बिउहार यक्कै नाईं अहय। औरत कय सोसन अउर मर्दवाद का मजबूत करब। वैसे तौ ई कमै भा अहय, मुला जहाँ भा अहय हुवाँ अच्छे से देखा जाय सकत हय। काव? इहय कि जब औरतय धरम के घन-चक्कर कय बखिया उधेड़त हयँ तौ ऊ बहुत फुर-वादी रहत हय। हियाँ कय सधुवाइन नास्तिक नाहीं अहयँ, मुला मनई मा औ’ भरमित भगवान-गिरी कय बिरोधी अहयँ : 

नकली मेर-मेर भगवान
वन्हैं मानैं सब नादान
बहुत दूर तक बहुत देर तक
उप्पर देखौ जाबौ जान….

वनकै भगवान क लयिके आपन दरसन अहय। दुनिया के बिराट मा वइ भगवान देखत हयँ। दुकानदारी मा तौ हरगिज नाहीं। आपन बुद्धी सबसे सजग साथी होइ सकत हय। बुद्धी न लगायी जाये तौ कहूँ न कहूँ फँसय क परे। अप्प दीपो भव — कय स्वर हियाँ देखा जाय सकत हय : 

सोचौ-समझौ खुदै विचारौ
दीया बारौ बुद्धी मा….

अंतिम बात ई कि अब पाहीमाफी पखवारी क्रम के बजाय, महिनवारी क्रम से पेस कीन जाये। फिलहाल आज ई दसवाँ भाग पढ़ा जाय औ अपने राय से अवगत करावा जाय। : संपादक 
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  • सधुवाइन कै परबचन

टोलिया मा आइन साधुवाइन
आपन बीती कुलि बतलाइन
बइठाय मरद-मेहरारू कां
कल्ले-कल्ले खुब समझाइन
टेढ़ी कुबरी हाथे पकरे
मरदाना पहिरावा पहिरे
लटकाये झोरा कान्हें पै
मचिया ऊपर बइठिन बहिरे 
माथे चन्दन, मूड़े साफा
चटपटिया पहिरे गोड़े मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

यकदम्मै उमर रही बारी
गवने मा आयन ससुरारी
घूंघुट निकारि करियाय उठेन
जइसै बछिया बान्हीं घारी
यक सांड़ महा कै खुदिहारै
सीन्हीं से वार करै हमपै
हम तूरि-तारि खूंटा-पगहा
राती मा भागि लिहेन जुरतै
भागत-बिड़रत कउनौ खानी
घर पहुँचेन होत भोरहरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भौचक देखयँ सब नात-बांत
दादा कै पारा आसमान
तू नाक कटाय दिहू बिटिया!
महतारिउ कै निकरै परान
खपरी कै पेनी, गलफुलनी
हेढ़ना यस पेट लिहे बाट्यू
नोखे मा यक ठू तुहीं हयू
जो  ससुरे-घर नाहीं जाब्यू!
जा! उल्टे गोड़े लउट जाव
नइहर की वोरी झांक्यू ना
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पकरे जंजीर दरवज्जा कै
चौखट ठाढ़े रोवैं माई
दादा से बोलिन रहै दियौ
जो बदा होई भोगा जाई
सोचत-सोचत पगलाय गयन
हम गयन बहाने से बहिरे
चल दिहेन अजोध्या कां सीधै
बांसे कै कइन हाथ पकरे
मन कहै बूड़ जाई समाय
सरजू माई के गोदी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

लागै दुनिया गै उलट-पलट
बत्ती दिमाग कै जलै-बुझै
काने बाजै तक-ताक-धिना
यक बड़ा बवंडर नाच करै
यतने मा देखेन यक कुतिया
निहचिन्ते टहरत जात रही
कुकुरै आपस मा लड़यँ- भिड़यँ
ऊ दूर बइठ कुंकुवात रही
मानौ हम रस्ता पाय गयन
जीयै कां ठान लिहेन मन मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

हम बदल-बदल मंदिर बदलेन
औ’ बदल दिहेन हाथे क् लकीर
सुख मिला बहुत खायन-पियन
हट्ठी – कट्टी होय गै सरीर
भगवान कै सेवा खूब किहेन
आगे कै गाथा ना गाइब
अन्दरखाने कै हाल-चाल
तोहरी सबकां ना बतलाइब
ई धरम-जाल सब भरम हुवै
कुच्छौ नाहीं बा भक्ती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बिन आग रहे ना उठय धुवाँ
हम पानी पीयन कुआँ-कुआँ
खुब अंधा-धुंध दरबार सजा
सब गधै पँजीरी खायँ हुवां
कल्ले-कल्ले कुलि जानि गयन
हमहूँ तब खेल करै लागेन
जे बहुत बनत रहे वनकां
ऊँगरी पै टहरावै लागेन
हम जवन-जवन देखे बाटी
नाचत बाटै कुलि आंखी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

परिसरमी केऊ बिना सरम
पेटे ताईं कुलि मेर करम
मूड़े कै बार सुफेद भवा
गिरहस्ती सबसे बड़ा धरम
जनता बाटै भोली-भाली
बछिया छुवाय पंडय लूटैं
मंदिर ना चढ़य चढ़ावा तौ
बड़के महंत सबकां डाटैं  
अपुवां ना पूजा-पाठ करैं
बस नाधे रहैं पुजारी कां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

ओखरी मा चाउर कूटा जाय
सूद – गरीबा लूटा जाय
भूसी – पइया हिगरि जाअ थै
मूरख बाभन पूजा जाय
जइसै करखाना कै मालिक
वइसै लागैं मंदिर-महंत
धइ लिइयं हलोरि चढ़ावा कुलि
बरहोमासा वनकै बसंत
कुछ चेला-चापर खटैं बहुत
दुइ जूनी खाय के बदले मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भगवान अगर मनई होते
मनई तब मनई ना होते
दुनिया-जहान कुछ ना होतै
जौ रूप-गंध वाले होते
निर्जीव नियामक निर्विकार
ना भाव-भावना कै आदी
वनके पाछे जे भागअ थै
ऊ करै समय कै बरबादी 
भगवान तौ ई ब्रह्माण्ड हुवै
सूरज – चंदा – तारै जेहिमां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

नकली मेर-मेर भगवान
वन्हैं मानैं सब नादान
बहुत दूर तक बहुत देर तक
उप्पर देखौ जाबौ जान
धरम-करम पाखण्ड न होतै
तब्बौ ई ब्रह्माण्ड तो होतै
नकली मर वोराय सब जाते
तब मरहम कै दरसन होतै
पाप-पुन्न सब यक्कै भाव
बाटै वनके लेखे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

सृष्टि-चक्र के सुन्दर जोड़ी !
भागौ ना भगवान की वोरी
मनमाफिक मौसम मा अपुवैं
पइदा हूवैं लिल्ली – घोड़ी
दुसरे के ना रह्यौ भरोसे
मिल-जुल कै निपटाओ काज
आपन जांगर प्यार-मोहब्बत
आपन सबसे बड़ा समाज
सोचौ-समझौ खुदै विचारौ
दीया बारौ बुद्धी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

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